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राहत कैंपों में उलझी राजनीति

उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद से ही मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी मुसलमानों की पहली पसंद रही है। लेकिन बाबरी ध्वंस के समय प्रदेश के भाजपा मुख्यमंत्री रह चुके कल्याण सिंह को समाजवादी पार्टी में शामिल किए जाने से नाराज मुसलमानों ने साल 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस को वोट देकर 22 लोकसभा की सीटें दिला दी थीं। मुसलमानों में समाजवादी पार्टी के प्रति ऐसी नाराजगी कम ही देखने को मिली है। 2012 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बड़े पैमाने पर सपा को वोट देकर उत्तर प्रदेश में उसकी सरकार बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही वजह थी कि समाजवादी पार्टी ने अनेक मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरुओं को अखिलेश सरकार में महत्वपूर्ण पद भी दिया।

नरेंद्र मोदी के भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित होने के बाद मुलायम सिंह यादव मुस्लिम वोटरों के फिर से कांग्रेस की तरफ जाने की आशंका से ग्रसित थे। सितंबर, 2013 में मुजफ्फरनगर दंगे के पहले से ही उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व की लहर पैदा करने की रणनीति पर हिंदुत्ववादी शक्तियां काम कर रही थीं। लेकिन राज्य की सपा सरकार छोटे-छोटे दंगों को रोक नहीं पा रही थी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा उन्हें रोकने के लिए शायद प्रतिबद्ध भी नहीं थी, क्योंकि वह इस माहौल में मुसलमानों के अपने पक्ष में गोलबंद होने की अपेक्षा कर रही थी। सपा नेतृत्व को लग रहा था कि सांप्रदायिक भय से ग्रसित मुस्लिम मतदाता आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की तरफ जाने से रुक जाएंगे।

पिछले साल अयोध्या में चौरासी परिक्रमा की इजाजत देने और इसके लिए मुख्यमंत्री आवास आए विश्व हिंदू परिषद के नेताओं को अत्यधिक सम्मान देने से जहां हिंदुत्व की पैरोकार शक्तियां अनियंत्रित हुईं, वहीं मुस्लिम तबके में समाजवादी पार्टी के प्रति शंका पैदा हुई। सांप्रदायिक दंगों के व्याकरण के जानकारों का कहना है कि नियंत्रित सांप्रदायिक गतिविधि कभी भी बेकाबू हो सकती है और यह अगर एक बार अनियंत्रित हुई, तो फिर किसी के काबू में नहीं रह जाती। ऐसा ही हुआ मुजफ्फरनगर में। इस दंगे के कारण लगभग 50 से 60 हजार के बीच लोग गांवों से भागकर विभिन्न राहत कैंपों में रहने को मजबूर हो गए।

‘राहत कैंप’ एक तरफ उत्तर प्रदेश की सपा सरकार के लिए जहां प्रशासनिक, नैतिक और राजनीतिक जिम्मेदारी बनकर विकसित हुए, तो दूसरी तरफ ‘दंगे के दाग’ पार्टी की छवि पर उभरकर दिखने लगे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, राहुल गांधी जैसे कांग्रेसी नेताओं का वहां जाना सपा को मुस्लिम मतों के संदर्भ में और असुरक्षित बनाता गया। ये ‘राहत कैंप’ सपा को अपने विरोधी दलों के लिए आगामी लोकसभा चुनाव में मुस्लिमों की गोलबंदी की वजह दिखने लगे। शायद इसीलिए सपा सुप्रीमो ने विवादास्पद बयान देकर मुस्लिम जनमत को और नाराज कर दिया। उन्होंने कहा कि इन राहत कैंपों में कांग्रेस और भाजपा के समर्थक व षड्यंत्रकारी रह रहे हैं।

प्रशासनिक रूप से अखिलेश सरकार का पक्ष है कि कैंप में रहने वाले दंगा प्रभावित लोगों को मुआवजा दे दिया गया है, और उन्हें अब कैंप छोड़कर घर लौट जाना चाहिए। वहीं कैंप में रह रहे लोगों का मानना है कि अभी सभी को मुआवजा नहीं मिला है, और जिन्हें मिला है, उन्हें भी नया घर बनाने में समय लगेगा। राहत कैंपों में रह रहे कई लोग गांवों में जाने से डर रहे हैं। अपनों को गंवाने का दर्द और खौफ अब भी उनकी आंखों में कायम है। सर्दी आते ही राहत कैंपों में रहने वालों की परेशानियां और बढ़ गई हैं। ठंड से कई बच्चों और वृद्धों की मौतें हुई हैं। राहुल गांधी और लालू यादव जैसे नेताओं के आने से राहत कैंपों की तरफ पूरे देश का ध्यान गया। जाहिर है, यह सपा के लिए अनुकूल स्थिति नहीं है। राज्य सरकार ने कुछ राहत कैंपों को हटाने के लिए बुल्डोजर तक का इस्तेमाल किया है।

दरअसल, समाजवादी पार्टी के भीतर विभिन्न मुस्लिम गुटों में अपने समुदाय के नेतृत्व को लेकर जारी टकराव ने राहत कैंपों पर सपा के निर्णयों को प्रभावित किया है और उसकी भूमिका को नुकसान पहुंचाया है। पार्टी के भीतर वरिष्ठ नेता आजम खां और उनके विरोधी मुस्लिम नेताओं में काफी अरसे से संघर्ष जारी है। इसलिए सपा को लगता है कि राहत कैंप न रहें, तो राहत केंद्रित राजनीति भी नहीं होगी और एक ‘विजुअल स्पॉट’, जो बार-बार मीडिया के कैमरे में आ रहा है, वह भी खत्म हो जाएगा।

मुजफ्फरनगर के दंगे ने बहुसंख्यकों को भी अपने प्रभाव में लिया है। हिंदुत्ववादी शक्तियों आरएसएस, भाजपा ने इसे हवा देने का कोई मौका नहीं छोड़ा। जेल से जमानत पर निकले आरोपी भाजपा विधायकों का मोदी की रैली में सम्मान इसी रणनीति का एक हिस्सा था। समाजवादी पार्टी की बड़ी चिंता यह है कि इस दंगे से उसके आधार वोट में सर्वाधिक असरदार यादव मत भी प्रभावित हुआ है। सपा नेतृत्व मोदी के पक्ष में हो रहे ध्रुवीकरण से बेहद चिंतित है। उसे लग रहा है कि कहीं उसका भी आधार वोट इससे प्रभावित न हो।

कांग्रेस मुजफ्फरनगर दंगे के प्रश्न पर सर्वाधिक मुखर है। 21 जनवरी को पार्टी मेरठ में इस प्रश्न पर एक बड़ी रैली भी करने जा रही है। बसपा ने भी मुजफ्फरनगर के राहत कैंपों के प्रश्न को उठाने की बात कही है, किंतु वह मुजफ्फरनगर दंगे को अभी तक बड़ा मुद्दा नहीं बना पाई है। इसके दो कारण हैं। पहला, इस दंगे में उसके भी एक नेता पर आरोप लगे हैं। पार्टी के नेता कादिर राणा इस मामले में गिरफ्तार भी हो चुके हैं। दूसरी वजह यह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसपा के आधार वोट वाली दलित जातियां भी हिंदुत्ववादी नारों से सहानुभूति रखती हैं। इस दंगे के कारण बसपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने दलित आधार को लेकर इस समय एक बड़े संकट से गुजर रही है। उसकी स्थिति ऐसी हो गई है कि ‘न खाते बने, न निगलते बने।’

उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा की सबसे मजबूत विरोधी पार्टी बसपा इस प्रश्न पर जहां असमंजस की स्थिति से गुजर रही है, वहीं दूसरी तरफ सपा खुद सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जाल में फंस गई है। देखना यह है कि 2014 के चुनाव तक ये पार्टियां इस राजनीतिक संकट से कैसे उबरती हैं?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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