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स्वास्थ्य क्षेत्र में पसरी क्षेत्रीय विषमता

स्वास्थ्य-क्षेत्र की उपलब्धियां दुख-दर्द दूर करने की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण मानी गई हैं। कुल मिलाकर स्वास्थ्य के प्रमुख सूचकांकों में भारत का स्थान अभी काफी पीछे है, हालांकि हाल के वर्षों में कुछ संदर्भों में सुधार दर्ज हुए हैं। पर बड़ी चिंता का एक विषय यह भी है कि कुछ राज्य बुरी तरह पिछड़ रहे हैं। समृद्ध राज्यों से पिछड़ते राज्यों की तुलना करें, तो यह स्पष्ट होता है कि कुछ प्रमुख स्वास्थ्य सूचकांकों में क्षेत्रीय विषमता बहुत बढ़ी है। इसके अलावा, गांव-शहर का फर्क बहुत है।

उदाहरण के लिए, पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर प्रति 1000 जन्म-दर के अनुपात में देखें, तो केरल इसे 13 तक कम करने में सफल रहा, जो विश्व स्तर पर एक प्रशंसनीय उपलब्धि मानी गई है। 2011 के उपलब्ध आंकड़े देखें, तो तमिलनाडु और महाराष्ट्र की उपलब्धि भी अच्छी मानी गई है, जो पांच वर्ष से कम आयु वर्ग में मृत्यु दर को क्रमश: 25 तथा 28 तक कम कर सके हैं। दूसरी ओर, इस वर्ष बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में यह मृत्यु दर क्रमश: 59, 73 व 77 है, जो बहुत अधिक है। मध्य प्रदेश की बाल मृत्यु दर केरल से छह गुणा अधिक है और उत्तर प्रदेश की मृत्यु दर इससे थोड़ी-सी कम है। इसी तरह, यदि मातृ मृत्यु-दर के आंकड़े को देखें, तो केरल में यह प्रति एक लाख 81 है, जबकि तमिलनाडु में यह 97 है। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश में नवीनतम उपलब्ध आंकड़ा 2007 में 318 दर्ज किया गया और असम में 390 दर्ज हुआ। 

एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष विभिन्न राज्यों में अपने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की विषमता के रूप में सामने आ रहा है। वर्ष 2011 में उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में बाल मृत्यु-दर 77 दर्ज हुई, जबकि शहरी क्षेत्रों में 54 रही। झारखंड के शहरी क्षेत्रों में यह दर 32 थी, तो गांवों में 57। मध्य प्रदेश व असम में गांव-शहर का अंतर और भी अधिक है। मध्य प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में यह मृत्यु-दर 50 दर्ज हुई, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 82 दर्ज की गई। असम में तो गांव-शहर का अंतर दो गुणा से भी अधिक पाया गया। यहां शहरी बाल मृत्यु-दर 39 पाई गई, तो ग्रामीण मृत्यु-दर 83। एक ही राज्य में ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में इतने बड़े अंतर से पता चलता है कि अभी गांवों में जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं के पहुंचने का कार्य काफी पिछड़ा हुआ है। चाहे ढांचागत प्रक्रिया कागजों पर पूरी हो गई है और प्राइमरी हेल्थ सेंटर और कम्युनिटी सेंटर बुनियादी इकाई के रूप संचालित हो चुके हों, पर बहुत से क्षेत्रों में अभी इनकी स्थिति ठीक नहीं है, यहां बुनियादी सुविधाओं और डॉक्टरों का अभाव है।

इसके अलावा, एक बड़ा सवाल यह भी है कि विभिन्न राज्यों की स्वास्थ्य उपलब्धियों में आखिर इतना बड़ा अंतर क्यों है? जो उपलब्धियां केरल और तमिलनाडु ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्राप्त की हैं, उनके करीब भी यदि हिंदीभाषी राज्य आ जाएं, तो लाखों जीवन बच सकेंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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