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डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेंट का धंधा पड़ा मंदा

पुलिस की क्राइम ब्रांच के शीर्षस्थ अन्वेषकों में उनकी गणना होती थी। इतनी ख्याति के बाद भी उन्होंने अचानक स्वैच्छिक रिटायरमेंट लेकर अपनी खुद की जांच कंपनी खोल ली। शुरू में छोटे स्तर पर उन्होंने विवाह प्रस्तावों को लेकर परेशान अभिभावकों की मदद की। किसी को समझाया कि खुद को समृद्ध एनआरआई बताने वाला युवक सिलिकन वैली में स्टार्ट-अप कंपनी का मालिक नहीं, बल्कि कैलिफोर्निया में संतरे के बागानों में फल तोड़ता है, तो किसी और को बताया कि प्रस्तावित नौजवान अलग-अलग शहरों में कई विवाह कर चुका घाघ मर्द है।

अगले चरण में डिटेक्टिव साहब के सीए ने कॉरपोरेट ग्राहकों के प्रतिद्वंद्वियों की राजनेताओं से गुपचुप सौदों का पर्दाफाश किया। लेकिन नए कर्मचारियों की उपलब्धता को लेकर वह परेशान थे। वह ऐसे सैनिटरी इंस्पेक्टरों की तलाश में थे, जो सड़ांध को दूर से सूंघकर उन तक पहुंच जाने में ही नहीं, बल्कि नालियों के अंदर कच्छे पहन पैठने में भी माहिर हों। मेहनताना सड़ांध मापने वाले यंत्र से जांचकर दिया जाएगा। जितनी दरुगध, उतना पैसा! इस अद्भुत विभाग का नाम उन्होंने बताया डीटीडी, यानी डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेंट।

मैंने पूछा, जो राजनीतिक दल आदर्शों के सहारे चलना चाहे, उसके लिए आपका यह डीटीडी किस काम का? वह हंसते हुए बोले, किस दल को विरोधी पार्टी की गंदगी की तलाश नहीं है? देखते जाओ। सब मेरी सूचनाएं मुंहमांगी रकम में खरीदेंगे। वैसे भी, अब गठबंधन सरकारें ही बनेंगी। अपने धंधे में मंदी का सवाल नहीं।

एक आदमी ने मुझसे डीटीडी में नौकरी दिलवाने को कहा। बोला, साहब, मैं पहले कब्र खोदने का काम करता था। आजकल गड़े मुर्दे उखाड़ता हूं। उसे लेकर अपने मित्र के पास गया, तो वह बिफर पड़े- यार, इस डीटीडी के चक्कर में बुरा फंसा। बुरा हो विधानसभा के चुनाव परिणामों का। जबसे नतीजे निकले हैं, पार्टियों ने आना ही बंद कर दिया। मैंने कारण पूछा, तो कहने लगे कि पब्लिक इतनी होशियार हो गई है कि गड़े मुर्दे उखाड़ने और गलीज दिखाने पर कहती है- इसे छोड़ो। यह बताओ कि आप की पार्टी काम क्या करेगी?और हमने इसका जवाब सोचा ही न था।

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