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ईमानदार नीयत

भाषाओं में जितने भाव व व्यवहार से संबंधित शब्द हैं, उनके विपरीतार्थक शब्द भी होते हैं। जैसे सुख-दुख, हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश। गोस्वामी तुलसीदास ने तो इन विपरीतार्थक शब्द-युग्मों को विधि के हाथ में बताकर कर्ता को निष्क्रिय बता दिया है। भगवान कृष्ण ने कर्ता को महत्वपूर्ण मानकर उसके कर्म पर बल देते हुए फल की इच्छा न रखने की सीख दी। एक शब्द है ईमानदार, जो व्यक्ति के कर्मों के विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है। उसके कर्म की दिशा देखकर उसके व्यक्तित्व का गुण बताता है। ईमानदार का विपरीतार्थक है बेईमान। बेईमानी का प्रतिफल है भ्रष्टाचार। इन दिनों कहा जाता है कि समाज में भ्रष्टाचारियों की संख्या अधिक हो गई है। अंगुलियां राजनेताओं व सरकारी अधिकारियों पर उठ रही हैं। बात ठीक भी है। उनसे समाज को नेतृत्व प्रदान करने की अपेक्षा रहती है। वे ईमानदार होंगे, तो समाज ईमानदार होगा। एक बात ध्यान देने की है कि सबसे पहले कर्ता की ईमानदार नीयत अपेक्षित है। हमारी नीयत ही हमारे कर्मों का मूल है। इसलिए किसी व्यक्ति के कर्मो का आकलन करना हो, तो उसकी नीयत को खंगालना चाहिए। नीयत एक प्रकार का संस्कार है, जिसमें जन्मजात गुण की कम व अर्जित की मात्र अधिक होती है। ईमानदार नीयत को अभ्यास और व्यवहार में लाने पर वह व्यक्ति की पहचान बन जाती है। इसलिए छोटी-छोटी दिनचर्याओं में भी ईमानदार व बेईमान नीयत का प्रकटीकरण होता है। लोग कहते रहते हैं, ‘नहीं! यह व्यक्ति चाहकर भी बेईमान नहीं हो सकता।’वह इसलिए भ्रष्ट नहीं बन सकता, क्योंकि भ्रष्टाचार उसके बूते की बात नहीं। उसकी नीयत ईमानदार है। अर्थात उसकी प्रकृति ईमानदार है। अभ्यास करके ईमानदार नीयत अर्जित की जाती है। एक बार ईमानदार नीयत का अभ्यास हो जाए व समाज में सिक्का जम जाए, फिर तो कहने ही क्या! ईमानदार नीयत से काम करने पर जो पहचान मिलती है, वह सुख देने वाली होती है।

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