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अंतरिक्ष में बड़ी उपलब्धि

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास में पांच जनवरी, 2014 का दिन एक मील के पत्थर की तरह दर्ज होगा। इस दिन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने जीएसएलवी-डी 5 का सफल प्रक्षेपण किया, जिसमें स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन का उपयोग किया गया है। इसके बाद भारत क्रायोजेनिक तकनीक विकसित कर सकने वाला छठा देश बन गया है। इसके पहले अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और ब्रिटेन ही यह तकनीक हासिल कर पाए हैं। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में बेशक सफलताओं की अनेक कहानियां हैं, लेकिन जीएसएलवी न बना पाना, भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की एक बड़ी नाकामी थी। स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन बनाने की कोशिश लगभग बीस साल से चल रही थी और उसके परीक्षण कई बार नाकाम हो चुके थे। जब पिछले दिनों भारत ने मंगल पर यान भेजा था, तब भी उसकी यही आलोचना हुई थी कि जीएसएलवी की नाकामी के मुकाबले यह उपलब्धि बेकार है और उसे जीएसएलवी का सफल परीक्षण करने पर ज्यादा जोर देना चाहिए। भारत का पीएसएलवी कार्यक्रम बहुत कामयाब है, लेकिन पीएसएलवी इंजन कम शक्तिशाली होता है और उससे कम वजन के उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित किए जा सकते हैं, जिनकी कार्यक्षमता भी कम होती है। अगर भारत को चंद्रमा और मंगल पर वैज्ञानिक प्रयोगों के क्षेत्र में कोई महत्वपूर्ण काम करना है, तो उसे ज्यादा शक्तिशाली जीएसएलवी की जरूरत होगी, और अब भारत ने क्रायोजेनिक तकनीक का सफल परीक्षण करके यह क्षमता हासिल कर ली है।

अंतरिक्ष विज्ञान में काफी कुछ राष्ट्रवाद और अंतरराष्ट्रीय राजनीति मिली रहती है और इस वजह से भी तमाम देश अंतरिक्ष कार्यक्रमों में काफी पैसा खर्च करते हैं। अक्सर देशों की आपसी होड़ की वजह से अंतरिक्ष विज्ञान में ज्यादा संसाधन और मेहनत खर्च की जाती है और इसकी वजह से अंतरिक्ष विज्ञान की काफी तरक्की भी होती है। इसकी वजह से अक्सर अंतरिक्ष कार्यक्रमों में कुछ ऐसी बातें होती हैं, जिनका भावनात्मक या प्रचार के लिए महत्व ज्यादा होता है और वैज्ञानिक महत्व कम होता है। भारत का मंगल मिशन ऐसा ही कार्यक्रम है, जिससे मंगल के बारे में हमारी जानकारी ज्यादा नहीं बढ़ेगी, लेकिन इससे हमारा राष्ट्रीय गौरव व आत्मविश्वास बढ़ता ही है और यह भी बड़ी उपलब्धि है। जीएसएलवी का यह परीक्षण ऐसी उपलब्धि है, जिसकी चर्चा आम लोगों में नहीं होगी, लेकिन जिसका महत्व हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए कहीं ज्यादा है। अभी तक अपने इनसेट जैसे उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने के लिए हमें विदेशी सहायता पर निर्भर रहना पड़ता था। अब हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम की तरक्की की राह में सबसे बड़ी रुकावट हट गई है।

कभी-कभी कठिनाइयां बेहतर उपलब्धियों का कारण बन जाती हैं। यह क्रायोजेनिक इंजन के बारे में भी सच है। भारत का इसके लिए एक रूसी कंपनी से करार था, पर अमेरिकी पाबंदी के चलते उसने भारत को यह तकनीक देने से मना कर दिया। उसके बाद 1994 में स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन बनाने का कार्यक्रम जोर-शोर से चल पड़ा। बाद में रूसी कंपनी ने क्रायोजेनिक इंजन सप्लाई कर दिए, लेकिन भारत ने अपनी कोशिश जारी रखी। अब भारत इस दिशा में और ज्यादा तरक्की कर सकता है और इसके व्यावसायिक लाभ भी हो सकते हैं। कई देश अपने उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने के लिए भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि यह अन्य देशों के मुकाबले किफायती है। इसरो ने एक बड़ी बाधा पार कर ली है और अब हम उसकी और ज्यादा उपलब्धियों के बारे में सुनेंगे।


 

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