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बेगमों की लड़ाई

बांग्लादेश को अक्सर ‘दो बेगमों की जंग का मैदान’ कहा जाता है। मुल्क की प्रधानमंत्री शेख हसीना और विपक्षी खेमे की मुखिया खालिदा जिया के बीच दुश्मनी इस हद तक है कि जब भी उनके बीच तलवारें खिंचती हैं, पूरा मुल्क ठहर जाता है। बांग्लादेश एक बार फिर कुछ ऐसे ही हालात से गुजर रहा है। इंतिखाब में सियासी पार्टी अवामी लीग को एकतरफा जीत मिली है, मगर मौजूदा संकट में यह सवाल मौजूं है कि इस बदहाल मुल्क की जम्हूरियत का मुस्तकबिल क्या होगा? इतवार को जब बांग्लादेशी वोट डालने अपने घरों से बाहर निकले, तभी से यह पक्का हो चुका था कि शेख हसीना फिर मुल्क की मुखिया होंगी। वैसे भी, जब इंतिखाबी मैदान में एक ही दमदार सियासी जमात हो, तब कुछ और की उम्मीद भी  कहां रह जाती है? बेगम जिया की पार्टी ने इंतिखाब के बायकॉट का फैसला किया और किसी भी अनहोनी से मुल्क को बचाने के नाम पर उन्हें अपने ही घर में नजरबंद कर दिया गया। वैसे गए हफ्ते से पहले उम्मीद जताई जा रही थी कि अपने छोटे-से इतिहास में यह मुल्क सियासी दंगे-फसाद का सबसे बुरा साल देखने के बाद शायद नए साल में सुकून की सांस ले और दोनों बेगम अपने मतभेदों को दरकिनार कर इंतिखाब को कामयाब बनाएं। मगर यह उम्मीद तब टूट गई, जब सुलह-सफाई की कोशिशें नाकाम हुईं और दोनों तरफ के लोग अपनी-अपनी बातों पर अड़े रहे। अपनी सियासी जिंदगी की शुरुआत में दोनों बेगमों ने साथ मिलकर काम किया, 1990 में फौजी हुकूमत को हटाने में इनके अहम किरदार रहे। लेकिन यह दोस्ती अगले ही साल इंतिखाब में दुश्मनी में बदल गई। रैलियों में एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने का दौर चल पड़ा। दोनों के पास ऐसे समर्थकों की कमी नहीं, जो जब चाहें मुल्क का माहौल बिगाड़ सकते हैं। एक ऐसा मुल्क, जिसे अपने अवाम के लिए दो वक्त की रोटी जुटाने का काम करना चाहिए, वह दो बेगमों की बरसों पुरानी सियासी दुश्मनी पर वक्त और पैसे बरबाद करता है। इस बात की जितनी भी निंदा की जाए, वह कम है। यह बेहद अफसोस की बात है कि लोग अपने इतिहास और तजुर्बे से भी नहीं सीखते, और सियासती लोगों की साजिशों के कारण मजलूम बनते हैं।
द पेनिनसुला, कतर

 

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