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किशोर पर दो बार मुकदमा नहीं चल सकता: सुप्रीम कोर्ट

किशोर पर दो बार मुकदमा नहीं चल सकता: सुप्रीम कोर्ट

केन्द्र सरकार ने सोमवार को उच्चतम न्यायालय में कहा कि 16 दिसंबर की सामूहिक बलात्कार की घटना में किशोर न्याय बोर्ड द्वारा दोषी ठहराये गये किशोर पर एक ही अपराध के लिये दो बार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। निर्भया के माता पिता ने किशोर न्याय बोर्ड की कार्यवाही निरस्त करके किशोर पर आपराधिक अदालत में मुकदमा चलाने का अनुरोध किया है।

महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय ने न्यायालय में कहा कि कानूनी और संवैधानिक दृष्टि से फिर से मुकदमा चलाना असंभव है, क्योंकि किशोर न्याय बोर्ड पहले ही किशोर को दोषी ठहरा चुका है और नये सिरे से मुकदमा चलाने का अनुरोध निरर्थक हो चुका है।

मंत्रालय ने हलफनामे में कहा है कि संविधान का अनुच्छेद 20 और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 300 के तहत एक ही अपराध के लिये दुबारा मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। किशोर न्याय : बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण: कानून, 2000 के तहत किशोर न्याय बोर्ड पहले ही किशोर आरोपी को दोषी ठहरा चुका है, इसलिए दुबारा मुकदमा चलाने का अनुरोध कानून की नजर में टिक नहीं सकता है।

महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय ने 16 दिसंबर के सामूहिक बलात्कार की शिकार लड़की के पिता की याचिका पर न्यायालय में दाखिल जवाब में यह दलील दी है। लड़की के पिता चाहते हैं कि इस किशोर पर किशोर न्याय बोर्ड में नहीं बल्कि फौजदारी मामलों की सुनवाई करने वाली अदालत में मुकदमा चलाया जाये।

न्यायमूर्ति बी एस चौहान की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष यह मामला आया था जिन्होंने पहले से ही लंबित भाजपा नेता सुब्रह्मणयन स्वामी की याचिका के साथ ही इसे संलग्न कर दिया है। स्वामी ने किशोर की परिभाषा की नये सिरे से व्याख्या करने का अनुरोध किया है।

स्वामी की दलील है कि किशोर न्याय कानून किशोर के बारे में सपाट व्याख्या प्रदान करता है कि 18 साल से कम आयु का व्यक्ति किशोर है और यह बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र समझौते :यूएनसीआरसी: और बीजिंग नियमों के खिलाफ है।

यूएनसीआरसी और बीजिंग नियमों के अनुसार आरोपी की आपराधिक जिम्मेदारी की आयु का निर्धारण उसकी मानसिक और बौद्धिक परिपक्वता को ध्यान में रखकर किया जायेगा। निर्भया के पिता ने भी यही सवाल उठाते हुये कहा था कि किशोर न्याय बोर्ड का 31 अगस्त, 2013 का निर्णय परिवार को स्वीकार्य नहीं है और इसीलिए वे किशोर न्याय :बच्चों की देखभाल और संरक्षण कानून की संवैधानिकता को चुनौती दे रहे हैं, क्योंकि ऐसा कोई प्राधिकार नहीं है जहां वे राहत के लिये जा सकें।

निर्भया के पिता चाहते हैं कि भारतीय दंड संहिता के तहत होने वाले अपराध के लिये किशोर अपराधी पर आपराधिक मामलों की अदालत में मुकदमा चलाने के प्रतिबंध संबंधी किशोर न्याय कानून के प्रावधान को असंवैधानिक घोषित किया जाये।

वकील अमन हिंगोरानी के माध्यम से दायर इस याचिका में कहा गया है कि इस अपराध के लिये किशोर पर आपराधिक अदालत में ही मुकदमा चलाकर उसे दंडित किया जाना चाहिए। याचिका में निचली अदालत के फैसले का हवाला दिया गया है जिसने चार वयस्क अपराधियों को मौत की सजा सुनायी थी। याचिका में इस किशोर अपराधी पर भी इसी तरह मुकदमा चलाने का अनुरोध किया गया है। यह किशोर अब वयस्क हो गया है।

राजधानी में 16 दिसंबर, 2012 की रात में छह व्यक्तियों ने चलती बस में एक लड़की से सामूहिक बलात्कार करने के बाद उसे बुरी तरह जख्मी कर दिया। इन आरोपियों में से एक किशोर था और इसलिए उस पर किशोर न्याय बोर्ड में मुकदमा चलाया गया था।

इस लड़की की बाद में 29 दिसंबर को सिंगापुर के एक अस्पताल में इलाज के दौरान मृत्यु हो गयी थी। इस वारदात में शामिल किशोर को किशोर न्याय बोर्ड ने किशोर न्याय कानून के तहत अधिकतम तीन साल की सजा सुनायी थी।

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