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शर्त यह है कि संभल जा तू

गोरखपुर। कार्यालय संवाददाता

प्रगतिशील लेखक संघ की द्वितीय गोष्ठी व बैठक निराला प्रेस पर असुरन चौक पर आयोजित हुई। गोष्ठी के दौरान युवा कवि सत्यम सिंह ने आम आदमी कुछ यूं बया करते हुए कहा- है वक्त अभी भी पर शर्त यह है कि संभल जा तू। था ले मेहनतकश का हाथ और इस अम्बर पर छा जा तू। गोरख यादव ने ईश्वर की तलाश इन पंक्तियों में की- तू तो दुनिया का घर बनाता है, मैने तो तेरा घर बनाया है।

ईंट पत्थर के हर कण में हमने अपना लहू मिलाया है। शायर एम जुबैर अहमद ने अपनी सरजमी को याद करते हुए कुछ तरह कहा--ये याद देते हैं लम्हा-लम्हा कि जन्नतों की जमी यहीं है। मुझे यकीं है, मेरे वतन से कोई भी धरती हसीं नहीं है। वरिष्ठ शायर हमदम ने मौन को यूं रेखांकित किया-मौन भी अक्सर मुखर हो जाता है। और गहरे तक असर हो जाता है। गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे महेश अश्क ने देश के तत्काल हालात पर कुछ यूं कटाक्ष किया- अंधेरा तो जहां भी है, बुरा है, मगर ये जुगुनुओं की रहमुनाई।

गोष्ठी में अनीस खान, प्रभुनाथ गुप्त, धर्मेन्द्र त्रिपाठी, सत्तन सत्यनारायण पथिक, अनिल गौतम, ओम प्रकाश श्रीवास्तव, सुनील श्रीवास्तव, कुमार नवनीत, चन्द्रशेखर शर्मा, रामजी कुशवाहा, अजीत सिंह सिंह और भरत शर्मा मुख्य रूप से उपस्थित थे।

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