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गुरु गोविंद सिंह जयन्ती की तैयारी हुई पूरी

हिन्दुस्तान संवाद अलीगढ़। सवा लाख से एक लड़ाऊं. तबै गोविंद नाम कहाऊं। यानि लाखों लोगों से लड़ने के लिए एक ही सिख काफी है। ऐसे थे धर्म गुरु गोविंद सिंह के विचार। सात जनवरी को गुरु गोविंद सिंह जयंती है। जिस के लिए नगर में तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। पंजाबी क्वाटर से लेकर नई बस्ती तक बैकुंठ नगर से मसूदाबाद तक पूरा सिख समाज गुरु गोविंद सिंह जयंती की तैयारियां करने में जुटा है।

इस बार शहर में पंडाल लगाना, लंगर बांटना, गुरु ग्रंथ पालकी की तैयारी, कीर्तन दरबार आदि के कार्यक्रम किए जाएंगे। सिखों का होता है अकाली स्वरूपसिखों का अकाली स्वरूप ऋषि मुनियों की तरह होता है। जिसमें जटाजूर,लम्बी दाढ़ी और बड़े् बाल ऋषियों के पुरातन दर्शन को दर्शाते हैं। गुरु गोविंद सिंह ने हर सिक्ख को पांच चींजें रखने की कहा है। इनमें कड़ा, कछहरा, केश, कृपाण और कंघा है। वहीं सिख कहलाता है जो पांच चीजें रखता है। पाठ से होता है कल्याणसुखमनी साहेब यानि सुखों की मनी।

इनमें 24 हजार इंसान की श्ंवास हैं और 24 हजार ही अक्षर। यह गुरु अर्जुन देव द्वारा लिखी गई है। वर्जन फोटो फोल्डरइस त्यौहार पर नगर कीर्तन में सभी लोग एक जैसे ही ड्रेस में होते हैं। जो बाहर से आए जत्थे लोगों की ओर से ही ये ड्रेस कोड दिया जाता है। जिससे दर्शाना चाहते हैं हम सिख् हैं। इस ड्रेस में सफेद और संतरी रंग का विशेष समावेश होता है। अधिकतर इसमें संतरी रंग की चुंदरी जत्थों द्वारा दी जाती है।

-हिना अरोराइस बार शहर में गुरु गोविंद सिंह जयन्ती पर सुबह में देहलीगेट गुरूद्वारा से पालकी निकाल कर मनाई जाएगी। इसके बाद गुरुद्वारे में लोग अरदास करने के लिए जाते हैं। इसके अलावा परवारथुरी, लंगर, सबद कीर्तन, पंडाल लगाना, गुरु ग्रंथ पालकी ये कार्यक्रम विशेष तौर पर किए जाते हैं। -पप्पू गुरु गोविंद सिंह जयन्ती सिखों का एक विशेष त्यौहार है जिसे सभी सिख बड़ी ही धूमधाम से मनाते हैं। इस त्यौहार पर दूर-दूर से जत्थे भाईयों को बुलाया जाता है।

जो कार्यक्रम होने तक रहते हैं। इस मौके पर शहर में भव्य पालकी और नगर कीर्तन भी कराया जाता है। -विजय कुमारआज से तीस साल पहले कंपनी बाग से प्रकाशोत्सव पर भव्य पालकी का आयोजन होता था। शामियाने के भव्य पांडाल में पूरा शहर समा जाता था। पूरे शहर में गुरु गोविंद सिंह जयन्ती का अलग ही अहसास होता था। शहर के गुरुद्वारों को सजा दिया जाता था। सभी लोग गुरुद्वारा में अरदास के लिए आते हैं। शहर में जगह-जगह पालकी के लोगों को पानी पिलाने की व्यवस्था भी की जाती थी।

उस तरह से तो नहीं मनाया जाता है इसमें हर साल थोड़ा -थोड़ा बदलाव आ रहा है। -रविंदर सिंह।

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