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आप का तिलिस्म और खतरे की घंटी

विंस्टन चर्चिल कहते थे कि राजनीति में एक हफ्ता लंबा समय होता है। यही बात अब भारतीय राजनीति में भी सही साबित हो रही है। आठ दिसंबर के बाद के चार हफ्तों में राजनीति काफी बदल गई है। मतगणना के समय किसी ने सोचा नहीं था कि राजनीति में कोई बड़ा बदलाव आने वाला है। लेकिन आम आदमी पार्टी यानी ‘आप’ की जीत ने पूरा माहौल बदल दिया है। एक साल पहले बनी पार्टी का नेता मुख्यमंत्री होगा, यह अकल्पनीय था। पर जैसे-जैसे आठ दिसंबर को वोटों की गिनती परवान चढ़ने लगी, सोच पर जमी मैल खुरची जाने लगी और नीचे की सतह चमकने लगी। आज नए साल में यह कहा जाने लगा है कि एक बड़ी राजनीतिक क्रांति ने देश में दस्तक दे दी है और लोकसभा चुनावों में भी यह दस्तक अपना असर दिखाएगी। जो लोग अन्ना आंदोलन के समय पूरे आंदोलन को एक बुलबुला साबित कर रहे थे और जो आंदोलन को एक अराजक-का-स्वप्नदोष बता रहे थे, वही अब उसका गुणगान कर रहे हैं।

आप की जीत और उसके बाद उठी बहस ने देश के राजनीतिक विमर्श को बदल दिया है। पहले जो चुनाव मोदी और राहुल के बीच महज एक जनमत संग्रह था, उस लड़ाई में एक तीसरे शख्स ने धूमकेतु की तरह प्रवेश कर लिया है और लोग कहने लगे हैं कि अगला चुनाव मोदी बनाम राहुल की जगह, मोदी बनाम केजरीवाल होगा। राहुल तीसरे नंबर पर हें। ऐसे में, यह सवाल लाजिमी है कि आप क्या लोकसभा चुनावों में अपना करिश्मा दोहरा पाएगी? और लोकसभा चुनाव में उसे कितनी सीटें मिलेंगी? और दोनों राष्ट्रीय पार्टियां, जो पहले एक-दूसरे को रोकने के लिए अपनी रणनीति बना रही थीं, अब आप को रोकने की जुगत में हैं। बीजेपी को इस बात की चिंता है कि कहीं आप मोदी की विजय यात्रा को तो नहीं रोक देगी? कांग्रेस की पेशानी पर बल पड़ रहे हैं कि कहीं उसकी सीटें दो अंकों में ही न सिमट जाए?

मेरा मानना है कि आप का ‘फेनोमिना’ बीजेपी और कांग्रेस, दोनों को बहुत तरसाएगा। कांग्रेस के लिए चिंता ज्यादा है, क्योंकि उसका और आप का मिजाज कई मायने में एक है। कांग्रेस को भारतीय संदर्भ में लिबरल-डेमोक्रेटिक-सेकुलर पार्टी माना जाता है। यानी एक ऐसी पार्टी, जो सबको साथ लेकर चलती है, जो वैचारिक स्तर पर जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र, पहचान और लिंग के आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं करती। और न ही अपनी विचारधारा में वह कट्टरपंथी है। वह सभी विचारों को समाहित करके चलने में यकीन रखती है। आजादी के पहले, और बाद में भी कांग्रेस में अगर वल्लभभाई पटेल और राजेंद्र प्रसाद जैसे परंपरावादी थे, तो जेपी और आचार्य कृपलानी जैसे समाजवादी भी थे। आजादी के बाद की पहली कैबिनेट में गांधी जी का जबर्दस्त विरोध करने वाले बाबा साहब अंबेडकर थे, तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी, जिन्होंने बाद में जनसंघ की स्थापना की। रफी अहमद किदवई जैसे वामपंथी भी नेहरू की कैबिनेट की शोभा थे।

नेहरू की आर्थिक नीति वामपंथी-समाजवादी विचारों से प्रभावित थी, लेकिन बाजारवाद-उदारवाद-पूंजीवाद की वकालत करने वाले मोरारजी देसाई भी कांग्रेस की कैबिनेट में ‘पावरफुल’ थे। देसाई इतने शक्तिशाली थे कि नेहरू की मौत के बाद वह प्रधानमंत्री पद के सशक्त दावेदार भी बन गए थे। कांग्रेस में अंबेडकर की जगह थी, तो जगजीवन राम भी कम ताकतवर नहीं थे। यानी कांग्रेस ऐसी पार्टी है, जो सभी विचारों का संगम है। वैचारिक लचीलापन ही उसकी पूंजी है। इसलिए लंबे समय तक समाजवादी रास्ते पर चलने के बाद 1991 में जब उसने बाजारवाद का मार्ग अपनाया, तो पार्टी में ज्यादा विरोध नहीं हुआ। अर्जुन सिंह जैसे लोगों ने थोड़ी आपत्ति जरूर जताई, लेकिन वह क्षणिक था। साल 2009 के बाद कांग्रेस की नीतियों में एक और बदलाव देखने को मिला। उसने बाजारवाद को मानवीय स्वरूप देने की कोशिश की।

शिक्षा का अधिकार, भूमि अधिग्रहण बिल, खाद्य सुरक्षा बिल लेकर आई। इसने बाजारवाद पर जोर के बावजूद कल्याणकारी योजनाओं में सब्सिडी झोंकने का काम किया। इसी वजह से आज फिर कांग्रेस को ‘लेफ्ट ऑफ द सेंटर’ पार्टी कहा जाता है। आप को भी लेफ्ट ऑफ द सेंटर ही माना जा रहा है। वह धर्म, जाति, संप्रदाय, पहचान और लिंग के आधार पर भेद नहीं करती है। संविधान के अनुच्छेद-377 का समर्थन करने में उसे तकलीफ नहीं है। वह कांग्रेस के पंचायती राज के विचार को मोहल्ला सभा तक ले जाने की पुरजोर वकालत कर रही है, जिसे वह स्वराज्य कहती है। वह सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात करती है। वह गांधी जी की तरह सत्ता में आम आदमी की भागीदारी मांगती है। वह कहती है कि जब तक सरकारें अंतिम आदमी तक नहीं पहुंचेंगी, तब तक सही मायने में न्याय आधारित समाज का गठन नहीं होगा और न ही सही अर्थों में लोकतंत्र प्रभावी होगा।

यह सही है कि कांग्रेस की तरह आप की आर्थिक नीति पूरी तरह से बाजारवाद का स्वागत नहीं करती। वह रिटेल सेक्टर में एफडीआई का विरोध करती है। पर उसे बाजारवाद से परहेज भी नहीं है। बस वह क्रोनी- कैपिटलिज्म को देश के लिए खतरा मानती है। सिवाय भ्रष्टाचार और सादगी के कांग्रेस और आप में वैचारिक स्तर पर ज्यादा फर्क नहीं है। ऐसे में आप का विस्तार कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी ही है। हालांकि, खतरा बीजेपी के लिए भी कम नहीं है। खासतौर पर नरेंद्र मोदी के लिए। बीजेपी अपनी विचारधारा में धर्म के आधार पर अल्पसंख्यकों को साथ लेकर चलने से परहेज करती है।

इसलिए गुजरात के दंगों पर वह माफी नहीं मांगती। मोदी मुस्लिम टोपी नहीं पहनते हैं। आप के साथ यह दिक्कत नहीं है। हिंदूवादी सोच के इतर मोदी ने शहरी मध्य वर्ग और युवा वर्ग में अपनी पैठ बनाने में कामयाबी हासिल की है। सोशल मीडिया, इंटरनेट, कार, और मोबाइल रखने वालों का एक बड़ा हिस्सा मोदी में देश का अगला प्रधानमंत्री देखता है। आप ने दिल्ली में यह साबित किया है कि ये वर्ग बेहतर विकल्प की स्थिति में मोदी और बीजेपी से किनारा भी कर सकते हैं। अगर ऐसा हुआ, जिसके साफ संकेत मिल रहे हैं, तो मोदी का सपना टूट सकता है। हमें ध्यान है कि 2009 के चुनाव में इसी शहरी मध्यवर्ग और युवा समाज ने कांग्रेस को जमकर वोट दिया था, उसे उम्मीद से भी कहीं ज्यादा 206 सीटें मिलीं। आज यह तबका भ्रष्टाचार, महंगाई, नेतृत्वहीनता, और संवादहीनता से त्रस्त है। कांग्रेस को झटका देने की फिराक में है। ऐसे में, जहां कहीं भी बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर होगी, वहां बीजेपी को तो फायदा होगा, लेकिन दिल्ली की तरह अगर आप बीच में आ गई, तो बीजेपी को नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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