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समुद्र के खारे पानी की सरहदों में फंसे मछुआरे

समुद्र की पानी में मछली पकड़ने के दौरान पाकिस्तान मैरीटाइम सिक्युरिटी एजेंसी के हाथों मारे गए भारतीय मछुआरे नरन भाई सोसा की खबर भले ही मीडिया में दब गई, मगर पिछले दिनों भारतीय मछुआरों के नुमाइंदों की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात में उस पर काफी चर्चा हुई। इन मछुआरों की दो मांगें हैं- एक, भारतीय कोस्ट गार्ड और पाकिस्तान मैरीटाइम सिक्युरिटी, दोनों के प्रतिनिधियों की आपसी भेंट हो। और दूसरी, नरन भाई सोसा की मौत की दोनों संगठन संयुक्त रूप से जांच करें। आंकड़ों के हिसाब से भारत की जेलों में 200 पाकिस्तानी मछुआरे बंद हैं और उनकी 150 नावें हमारे कब्जे में हैं, जबकि पाकिस्तान की हिरासत में 229 भारतीय मछुआरे हैं और 780 नावें हैं। भारत एवं पाकिस्तान के बीच के समुद्र में एक-दूसरे की सीमा में दाखिल होने के मामले में वे मछुआरे ज्यादा शिकार बनते हैं, जो भारत के गुजरात राज्य और पाकिस्तान के सिंध सूबे से हैं। दोनों देशों में बंटी इस सरहद को समुद्र में बांटने वाली कोई भौतिक सीमा रेखा या बाड़ तो खड़ी है नहीं कि मछुआरे जान सकें कि वे दूसरे की सीमा में प्रवेश कर रहे हैं। यहीं पर वह सरक्रीक इलाका भी है, जिसे लेकर दोनों देशों के बीच विवाद अभी तक सुलझ नहीं सका है। अधिकतर स्थानीय मछुआरों की नावें भी साधारण किस्म की होती हैं तथा उन पर नौकायन के उपकरण लगे नहीं होते हैं, ताकि अपने स्थान को -अक्षांश और रेखांश को वह ठीक से जान सकें और दूसरे देश की सीमा में प्रवेश करने से पहले ही अपनी नाव को मोड़ लें।

समुद्र किनारे के गांव वालों की तरफ से मछुआरों की नावों के या मछुआरों के लापता होने के बारे में खबरें आती रहती हैं, मगर उनकी स्थिति का बरसों तक पता नहीं चल पाता। उनके परिवारों को तो न जाने कब तक इसका दुख झेलना पड़ता है। हालात दोनों तरफ यही हैं। कुछ समय पहले भारत के कुछ पत्रकारों ने पाकिस्तान के ऐसे कई मछुआरों के परिवारों से मुलाकात की थी, जो भारत की जेलों में बंद हैं। इनमें कराची के एक गांव की 15 साल की सुगरा की दास्तान बहुत मर्मस्पर्शी थी, जिसने अपने वालिद को सिर्फ तस्वीर में ही देखा था। उसकी मां ने बताया था कि वह जब तीन महीने की थी, तभी मछली पकड़ने गए उसके पिता और अन्य मछुआरों को कोस्ट गार्ड के सिपाहियों ने गिरफ्तार किया था। वजह थी, उनका भारतीय समुद्री सीमा में प्रवेश कर जाना। सिद्धांत रूप में तो भारत-पाकिस्तान, दोनों के ही अधिकारी और नेता इस बात पर सहमत हैं कि इन बेगुनाह लोगों को बेवजह सजा नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन समस्या को खत्म करने के लिए कुछ नहीं होता। दोनों देशों के प्रतिनिधि जब आपसी विवाद सुलझाने के लिए साथ बैठते हैं, तो मछुआरों का मुद्दा उनकी प्राथमिकता सूची में नहीं होता, जबकि इस मसले पर असहमतियां भी ज्यादा नहीं हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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