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खलनायक जमाने में नए वर्ष का नायक

न हम कल की जानते हैं, न हमें ज्योतिष में विश्वास है। हमें इतना पता है कि आदमी के मन में अतीत का आकर्षण है, वर्तमान से असंतोष और भविष्य के प्रति उत्सुकता। भविष्यवक्ता और नेता इसी का फायदा उठाते हैं। बाहर कोहरा है, घर में खिड़की से आती ठंडी हवाएं। जाने बड़े बाबू क्यों फरमाते हैं कि साइबेरिया में हिन्दुस्तानी बच्चों को निमोनिया नहीं होगा? हमें तो सिर से पांव तक कंबल ओढ़कर कंपकंपी आ रही है। फुटपाथियों का क्या होगा? सुख-सुविधा से लैस लोग अक्सर संवेदनहीन हो जाते हैं। उम्मीद की एक किरण पेड़ की फुनगी पर बैठी चिड़िया की चहचहाहट है। उसे तन ढकने को न कपड़े हैं, न कंबल। फिर भी वह जीवित ही नहीं, मुखर भी है। उसकी आवाज ढाढ़स बंधाती है, जैसे वह सूरज की ऊष्मा के हरकारे लगा रही हो। उसकी नन्ही जान मौसम की मार झेल सकती है, फिर हम तो इंसान हैं। ऊपर वाले की कथित सर्वश्रेष्ठ कृति।

अचानक नए साल का खयाल आता है। वह क्या लेकर आएगा? क्या यह नया झोला भी सामने की सड़क-सा छेददार होगा? निर्थक वायदे, इरादे और आश्वासन पतझर के सूखे पत्तें-से झरते रहेंगे, पिछले कई वर्षों की तरह? कोई पढ़ा-लिखा युवा रोजगार मांगेगा, तो कहीं सस्ते अनाज का झांसा पाएगा, तो कहीं लैपटॉप का लॉलीपॉप। अंदर सर्दी का सन्नाटा है, बाहर खिड़की से छनकर आता नारों के आर्तनाद का कोहराम। आम चुनाव की आहट अभी से आ रही है। यही समय है, जब सारे सियासी दल उस आम आदमी को याद करते हैं, जिसका अस्तित्व मिटाने को उन्होंने सारे सरकारी हथकंडे अपनाए हैं। वसूली की अनिवार्यता ने उसकी रोजी छीनी है, तो कभी महंगाई से उसके मुंह का निवाला। इन्हें अंदर ही अंदर आश्चर्य है। बावजूद हर कोशिश के यह इंसानी शक्ल का चुनावी कच्चा माल अब भी जीवित ही नहीं, अच्छी तादाद में मौजूद है। उनकी एक ही कोशिश है। कैसे नए साल का नायक बनकर इसके वोट झटकें? ज्योतिषी ने भरोसा दिलाया है। पहले उनका भिक्षा-योग है। उसके बाद कुरसी और वायदे तोड़ने का राज-रोग तो लगना ही लगना है।

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  • Web Title:खलनायक जमाने में नए वर्ष का नायक