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आम आदमी की ताकत

अचानक लोगों की एक सोई हुई ताकत जागकर बुलंदी छू रही है, और वह है आम आदमी की ताकत। मानो सदियों से सोया हुआ ज्वालामुखी जाग उठा और आग उगलने लगा। आम आदमी की ताकत क्या है? महज यह कि वह आम है, और आम होने में उसे कोई झिझक नहीं है। उसे यह भी नहीं पता कि यह कोई ताकत है, लाखों की संख्या में जब आम लोग जुड़ जाते हैं, तो ताकत बनती है। ओशो ने हमेशा आम यानी साधारण होने पर बहुत जोर दिया। वह खुद को भी एक ‘ऑर्डिनरी मैन’ कहते थे। उनका कहना था कि साधारण होना और उसमें प्रसन्न होना बहुत बड़ी असाधारणता है। साधारण या आम होना कोई निंदाजनक नहीं है, वरन एक सहज स्वीकृति है अपने होने की। जो जैसा है, वैसा उसे प्रकृति ने बनाया है। जैसे घास का फूल छोटा है और कमल का फूल बड़ा, दोनों को वैसा होने में कोई ऐतराज नहीं है। लेकिन मनुष्य को अपने जैसा होने में बहुत ऐतराज है।

वह हमेशा तुलना करता है अपने से बड़ों के साथ, इसलिए सदा दुखी रहता है। मानो जीवन कोई दौड़ है, जहां हर आदमी को पहला नंबर हासिल करना है। यह अहंकार इतना मजबूत हो गया है कि हर आदमी विशिष्ट होना चाहता है। खासकर सत्ता में हर व्यक्ति विशिष्ट होना चाहता है, क्योंकि जिनमें कोई हीनता की ग्रंथि है, वही सत्ता की ओर आकर्षित होते हैं। जब भी आप किसी को दिखाना चाहते हैं कि मैं कुछ हूं, इसका मतलब गहरे में आप जानते हैं कि मैं कुछ नहीं हूं। असली आम आदमी आम होने से संतुष्ट है। आम यानी छोटा नहीं, आम यानी जो खुद का सम्मान करता है, अपने उसूलों के लिए मजबूती से खड़ा हो सकता है- शांति से, मौन से। उसे आक्रामक होने की, अपना प्रचार करने की आवश्यकता नहीं होती। उसकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं होती। बड़ी से बड़ी ताकतें उसकी आंतरिक शक्ति से पराजित हो जाती हैं।

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