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यंगिस्तान की कविता

एक समूची पीढ़ी आ गई है। उसकी कविता नहीं आए, यह कैसे हो सकता है? आदमी का पहला मधुर क्रंदन ही तो उसकी पहली कविता होती है, सो इस पचपन प्रतिशत पीढ़ी की भी कविता है और बाजाप्ता है। इसे ई-पीढ़ी की कविता कहा जा सकता है। जनरेशन नेक्स्ट की कविता। यंगिस्तान की कविता। हिन्दी की स्वार्थ-सूचनात्मक आलोचना पढ़िए तो उसमें इसकी मीलों तक खबर ही नहीं है। वहां सारे जरायु-जटायु अपने जले पंखों को समेटे यंगिस्तान को शाप दे रहे होते हैं कि सारी पीढ़ी बिगड़ गई है। यह क्या करेगी? इसका सांस्कृतिक पतन हो गया है, रात-बिरात लौंडियों को बगल में दबाए नाचना-गाना। ़इनके पास क्या है? इस जर्जरिस्तान-कब्रिस्तान के दिल में एक गहरी टीस उठती है : हाय अपने जमाने में तो एक गांव के खूंटे से बांध दी। मैली कुचैली। जाते तो बच्चा दे आते। पालती रहती। ‘प्रतिभा’ की पहचान कराने के लिए दो-चार शहर में पटा डालीं! लेकिन ऐसा बढ़िया इतना सेक्सी फैशनेबल करीना कपूर -कैटरीना कैफ वाला मस्त-मस्त जमाना तब क्यों नहीं आया, जब हम जवान रहे? इस जर्जरिस्तानी कब्रिस्तानी-प्रोफाइल के बरक्स यंगिस्तान की प्रोफाइल अलग है। जींस, टीशर्ट, तेज मोटरसाइकिल कैट, जी मैट और आईटी, आईआईएम की तैयारी, हारवर्ड स्टानफोर्ड की ओर नÊार अपने कमरे में अपने आईपॉड पर अपना गाना सुनता नाचता गाता घर लैपटॉप पर अपने चैट समूह से बात करता अपने ब्लॉग से सबसे पंगा लेता एक बड़ा यंगिस्तान अपने माताश्रियों की अनुसनी करता मुंह बिराता हुआ अपनी दुनिया में मगन रहता है। उसे कल सुबह कैट देना है और शाम को पार्टी में जाना है। फिर पीवीआर में फिल्म देखनी है। ढेर सारे लड़के-लड़कियां रहते हैं इस यंगिस्तान में। ये हर जर्जराग्रस्ती के घर में अपने आप नहीं बने, बल्कि जर्जराग्रस्तियों, गृहस्थियों में माताश्रियों-पिताश्रियों की दमित आकांक्षाओं कामनाओं को फलीभूतन हैं। सबने इन्हें अच्छे से अच्छे अंग्रेजी स्कूल दिए, टय़ूशन कराए और वह सब दिया जो उनके पास कभी नहीं रहा, ताकि ये विश्वविजय करके दिखलाएं। अमेरिका जा के दिखलाएं, डालरमय हो घर भर दें। सात पीढ़ियों की गरीबी को काट दें। यही यंगिस्तान है जो हर हिन्दी के जर्जराकवि के आसपास, ऐन घर में मुहल्ले में, सड॥क पर हर कहीं बन रहा है और इससे उसका कोई सकारात्मक संवाद तक नहंी हैं। जिस पर वह कवि ठाठ से कविता करता रिव्यू कराता है कि वो महान है जो धरती पर अहसान करने आया है। सारे जर्जर मिलते हैं और अपने ही जैसे थके मांदे गठियाग्रस्त दर्दीले घुटनों और गर्दनों पर रखे बालरंगे चेहरों से देखते हैं कि उनके साथ जो कुछ है, वह वही जर्जर वृद्ध दुनिया बची है जो ‘मुन्नाभाई’ के ‘सेकिंड इनिंग्स’ की तरह भी नहीं है, जिसमें इस यंगिस्तान की लीला को पूरी ‘उदार जगह’ है। उसके लव को पूरा स्पेस है। किशोरों की भी कामनाएं हैं, इच्छाएं हैं। सपने हैं और संकल्प हैं। ये सब मिलकर कविता बनाते हैं, कहानी बनाती हैं। इनकी ब्लॉगी दुनिया पढें़। इनके चैट में जाकर देखें ़इनके आेरकुट समूहों में देखें तो एक कविता, एक कहानी, एक आलोचना हरदम होती रहती है। बहुत सारी रचनात्मकता यहां मिलती है, ़इनके एसएमएसों में मिलती है। अरे जिस पीढ़ी ने आकर अंग्रेजी-हिन्दी दोनों बड़ी भाषाओं के पत्र-लेखन की, संदेश- लेखन की शैली को बदल डाला, क्या उसके पास कम सृजनात्मक उर्जा है? उनकी कविता एसएमएस में मिलती है। जिसने चिट्ठी लेखन की जगह ले डाली है। उसकी कहानी जेसिका लाल से लेकर आरुषि के प्रति संपेथी दिखाने में मिलती है। संलग्नता में मिलती है। उसके भी सोशल क्षेत्र हैं करार हैं, मानवाधिकार उसे पसंद हैं। एक सिविल स्पेस उसे जरूरी लगता है। सिविल सोसाइटी उसका सपना है। ये कम महान सपने नहीं हैं। समाजवाद इसी में से होकर अब आ-जा सकता है। यह पीढ़ी एक सरल सूत्र वाली भी नहीं, समाज की तरह अनेक खानों में बंटी है। मगर करीयर, खुली ग्लोबल स्पर्धा, बाजार, विकास और उससे जुड़े तमाम मूल्यों से बनती हुई यह उसी सब में अपने मूल्य गढ़ती है। यही बस उसकी कविता-कहानी में रहता है। आप कहेंगे कि इस पीढ़ी की रचना के उदाहरण दें। हमारा कहना होगा कि आप उसे ढूंढें़। वह मुक्ितबोध की अस्मिता की तरह परम-अभिव्यक्ित की तरह, हर कहीं, हर गली, हर चौराहे, हर मोड़ पर मौजूद है। चाहिए उसे देखने-पढ़ने वाली आंखें।

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