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राजनीति जो प्रेस को बर्दाश्त नहीं करती

ाब एक महीने के अंदर देश के चार प्रांतों से खबर आती है कि मीडिया पर हमला हुआ है, या उनके खिलाफ केस दर्ज हुआ, तो यह चिंता की बात है। ऐसे अवसर पर पत्रकार जल्द ही जुलूस निकालने और विरोध करने में व्यस्त हो जाते हैं। सिर्फ उस शहर में नहीं जहां घटना हुई है, पर देश के दूसरे शहरों में भी। सब जगह प्रेस की आजादी का नारा सुनाई पड़ने लगता है। पर इसके बावजूद हमले की घटनाएं बढ़ गई हैं। हमला या पुलिस प्रेशर किस दिशा से आ रहा है, और किस कारण? जून के पहले हफ्ते में टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार शोर मचाने लगा कि देखो, हम डॉकूमेंटेड इनवेस्टीगेशन रिपोर्टे छापते हैं, जो अहमदाबाद के नागरिकों के हित में है और बदला लेने के लिए अहमदाबाद के नए पुलिस कमिश्नर ने हमारे ऊपर देशद्रोह का केस दर्ज कर दिया है! जब कोई बड़ा अखबार प्रेस फ्रीडम के नाम शोर मचाता है, जल्द ही बहुत लोग उसके समर्थन में शामिल हो जाते हैं। अहमदाबाद शहर के नए पुलिस कमिश्नर की नियुक्ित होते ही टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक सीरीज छापी कि शहर को ऐसा पुलिस कमिश्नर मिला है, जिसका संबंध एक माफिया डॉन के साथ था। इसे स्थापित करने के लिए अखबार ने सीबीआई द्वारा 1में जुटाए गए साक्ष्य को पेश किया। नए पुलिस कमिश्नर ने तुरंत अखबार के ऊपर देशद्रोह, आपराधिक षड्यंत्र और मानहानि के आरोप लगाए। जिसकी शिकायत दर्ज हुई नारंगपुरा पुलिस स्टेशन में, जो उनके ही यूरिस्डिक्शन में है। यह मामला जब चल रहा था, पड़ोस के प्रांत महाराष्ट्र में एक राजनीतिक पार्टी ने एक अखबार के सम्पादक के घर पर हमला किया, क्योंकि उनका लिखा हुआ सम्पादकीय उन्हें पसंद नहीं आया। कुमार केतकर ने लोकसत्ता अखबार में राय सरकार के शिवाजी के नाम बहुत बड़ी प्रतिमा समुद्र के बीच में बनाने की योजना पर एक संपादकीय लिखा था। इस घटना के बाद भी पूरे देश में काफी शोर मचा, पत्रकार और नेता दोनों ने इस हमले की निंदा की। और इसके बीस दिन बाद आंध्र प्रदेश से खबर आई कि एक संपादक और दो पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया है, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (प्रिवेंनशन ऑफ एक्ट्रोसिटीज) एक्ट के केस में। आंध्र योति अखबार ने कुछ लिखा था अनुसूचित जाति के नेताओं के बारे में जिसके बदले में उस राजनीतिक समिति के लोगों ने अखबार के कार्यालय पर हमला किया। विरोध हुआ और पुतला जलाया गया। पुलिस का आरोप है कि एक अनुसूचित जाति केड्ढr नेता के पुतले को अखबार के पत्रकारों ने चप्पल से मारा। और उस घटना के एक दिन बाद केरल से खबर आई कि सीपीआई-एम की छात्र शाखा स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया ने पत्रकारों पर और मलयालम मनोरमा अखबार की इमारत पर हमला किया। क्योंकि इनका कांग्रेस के छात्र संगठन के साथ झगड़ा हुआ और वहां खड़े हुए मनोरमा के पत्रकार पर उनका गुस्सा भड़का। पत्रकारों का कहना है कि पुलिस देखती रही। ये चारों घटनाएं बताती हैं कि मीडिया को लेकर राजनीतिक वर्ग में असहिष्णुता बढ़ गई है। कोई भी पुलिस अधिकारी राय सरकार की इजाजत के बिना किसी अखबार पर देशद्रोह का मुकदमा नहीं दर्ज कर सकता। मोदी सरकार के मन में अंग्रेजी मीडिया के प्रति कोई खास सम्मान का भाव नहीं है। आंध्र प्रदेश में राजशेखर रेड्डी सरकार कई दिनों से मीडिया से नाराज है और फिर शत्रुता भी है। उनके बेटे ने एक अखबार शुरू किया था ताकि वो इनाडु और आंध्र योति जसे अखबारों की सरकार विरोधी रिपोर्टिग का जवाब दे सकें। लेकिन महाराष्ट्र का मामला राजनैतिक असहिष्णुता का सबसे अच्छा उदाहरण है। क्या अब कोई राय सरकार की योजनाओं की आलोचना भी नहीं कर सकता? और केरल की राजनीतिक गुंडागिरी से इस असहिष्णुता के अलावा एक और चीज जाहिर होती है- लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका को नजरअंदाज करना। पहले जमाने की तुलना में दो चीजें बदल गई हैं। मीडिया का काम आजकल खुद राजनीतिक दल करने लगे हैं, अपनी मीडिया कंपनियों के जरिए। और मीडिया जसी संस्था के प्रति राजनीति करने वालों के मन में कोई इज्जत ही नहीं बची। क्या वो इसलिए है कि हमारे नेता पहले जसे नहीं रहे, या फिर इसलिए कि मीडिया पहले जसा नहीं रहा?ं

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