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भाजपा की ओर दलबदलुओं की दौड़, इसमें कई दागी

भाजपा की ओर दलबदलुओं की दौड़, इसमें कई दागी

लोकसभा चुनाव नजदीक आते देख दलबदलू नेताओं ने नये और सुरक्षित ठिकाने ढूंढ़ना शुरू कर दिया है। इसी क्रम में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की उत्तर प्रदेश में सफल रैलियों के बाद पार्टी की ओर दूसरे दलों के लोगों की दौड़ बढ़ गयी है।

इसमें कुछ तो दागी हैं और कुछ ऐसे हैं जिन्हें पार्टी कार्यालय में घूमते देख कार्यकर्ताओं में रोष है, लेकिन ऐसे लोगों पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का वरदहस्त बताया जाता है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के कद्दावर नेता रहे पूर्व मंत्री बाबूसिंह कुशवाहा के काफी नजदीक रह चुके विधान परिषद सदस्य राम चन्द्र प्रधान का नाम आज कल सुर्खियों में है। उन्हें दो दिन पहले भाजपा के प्रदेश कार्यालय में देखा गया।

प्रधान की पत्नी अनीता प्रधान उन्नाव सीट से टिकट मांग रही हैं। बसपा शासनकाल में काफी रसूखदार रहे प्रधान के राजनीतिक संरक्षक माने जाने वाले कुशवाहा के एनआरएचएम घोटाले में जेल जाने के बाद उनका संक्रमणकाल शुरू हो गया था। प्रधान का बसपा में दबदबा समाप्त हो जाने के बाद अब वह नया ठिकाना खोज रहे हैं। सूत्रों ने बताया कि भाजपा महासचिव और प्रदेश प्रभारी अमित शाह ने हाल ही में एक बैठक के बीच से उठकर प्रधान से एकान्त में 20 मिनट से अधिक देर तक बात की। इसे लेकर पार्टी में चर्चाएं जोरों पर हैं।

सूत्र बताते हैं कि जिस बैठक से उठकर शाह ने प्रधान से अलग मुलाकात की थी, उसी में दलबदलुओं को पार्टी में नहीं लिये जाने की जोर-शोर से मांग उठी थी। यह मांग कितनी कारगर होगी यह तो समय ही बतायेगा। एनआरएचएम घोटोले की आंच प्रधान तक आयी थी और सीबीआई ने इनसे भी पूछताछ की थी। कुशवाहा को शामिल करने का नुकसान पार्टी विधान सभा चुनाव में भुगत चुकी है, ऐसे में प्रधान की ओर पार्टी के कुछ बड़े नेताओं के बढ़े रुझान से आम कार्यकर्ता रोष में दिखायी पड़ रहा है।

भाजपा प्रदेश कार्यालय में इस समय पूर्व मंत्री फागू चौहान भी खूब दिखाई पड़ रहे हैं। चौहान भाजपा शासनकाल में मंत्री थे, लेकिन पार्टी का जनाधार सिकुड़ते ही वह बसपा में शामिल हो गये। चौहान मायावती के पिछले मुख्यमंत्रित्वकाल में मंत्री थे। वह गत विधान सभा चुनाव में बसपा के टिकट पर घोसी सीट से चुनाव हार गये थे। अब वह लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहते हैं। उन्हें भाजपा कार्यालय में देखते ही यह चर्चा काफी तेज हो गयी कि चौहान जल्द भाजपा में शामिल हो सकते हैं।

कैसरगंज से समाजवादी पार्टी (सपा) सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह ने इस बार सपा से चुनाव नहीं लड़ने का एलान कर दिया है। उन्होंने टिकट भी वापस कर दिया। कयास लगाया जा रहा है कि वह भाजपा से ही लड़ेंगे। नरेन्द्र मोदी की बहराइच रैली में सिंह के पुत्र प्रतीक भूषण सिंह के वाहनों का काफिला सभी की जुबान पर है। प्रतीक भूषण ने सैकड़ों वाहनों के काफिले के साथ मोदी की रैली में भाग लिया था। माना जा रहा है कि सिंह को भाजपा हाईकमान से हरी झण्डी मिल गयी है। उनके पार्टी में शामिल होने की महज औपचारिकता शेष है।

बसपा ने श्रावस्ती लोकसभा क्षेत्र से धीरेन्द्र प्रताप सिंह उर्फ धीरू का टिकट क्या काटा कि वह भाजपा की ओर मुखातिब हो गये। सूत्रों का दावा है कि उन्होंने भाजपा के एक बड़े नेता की पैरवी लगाई है, हालांकि उन्हें अभी पार्टी में शामिल नहीं किया गया है, लेकिन वह निराश नहीं हैं और जल्दी ही उन्हें भाजपा में शामिल किये जाने की सम्भावना है। अपराधिक छवि के सुल्तानपुर जिले के रहने वाले सोनू सिंह और उनके भाई मोनू सिंह को पार्टी में शामिल ही कर लिया गया है। यह दोनों भाई सपा और बसपा में रह चुके हैं।

सपा के पूर्व सांसद हरिकेवल प्रसाद के पुत्र रवीन्द्र कुशवाहा भाजपा में शामिल होने के प्रयास में लगे हैं, तो पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत चन्द्रशेखर के पुत्र पंकज शेखर को हरी झण्डी मिल गयी है और वह सलेमपुर क्षेत्र से लोकसभा के टिकट के दावेदार हैं। पूर्व विधायक कौशल किशोर मोहनलालगंज (सु) क्षेत्र से टिकट चाहते हैं तो अक्षय प्रताप उर्फ लल्ला सिंह श्रावस्ती सीट से लड़ना चाहते हैं। हमीरपुर से बसपा सांसद विजय बहादुर सिंह को इस बार भाजपा से चुनाव लड़ने की हरी झण्डी लगभग मिल चुकी है।

इसी क्रम में बस्ती सीट से सीपी शुक्ला, रायबरेली से अजय अग्रवाल और बृजेश सिंह, बाराबंकी से आयकर के एक वरिष्ठ अधिकारी की पत्नी प्रियंका रावत, लालगंज (सु) से दुर्गा प्रसाद सरोज, चन्दौली से निर्दलीय विधायक सुशील सिंह, अमेठी से डॉ. संजय सिंह और नगीना बिजनौर से पूर्व आईएएस अधिकारी आरके सिंह भाजपा से टिकट चाहते हैं। यह सभी या तो भाजपा में शामिल हो गये हैं या शामिल होने की पाइपलाइन में हैं।

मोदी के पक्ष में माहौल होने के बावजूद भाजपा के पास व्यवहारिक दिक्कत यह है कि उत्तर प्रदेश में लोकसभा की कुल 80 सीटों में से ज्यादातर पर जिताऊ उम्मीदवार नहीं हैं। ऐसे में दलबदलुओं या राजनीतिक अवसरवाद के माहिर नेताओं की पौ बारह होना स्वाभाविक ही है।

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