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दिल्लीवालों के लिए कम एक भारंगम

नाटक देखने वाले लोग दिल्ली में काफी हैं। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के 16वें भारत रंग महोत्सव के पहले चरण के लिए टिकटों की 1.5 लाख रुपए की रिकॉर्ड बिक्री इसका एक सबूत है। इस महोत्सव को छोड़कर यहां नाटकों का कोई इतना बड़ा आयोजन नहीं होता। इसलिए यहां ऐसे अनेक कार्यक्रम आयोजित होने चाहिए। भारंगम, थियेटर का अंतरराष्ट्रीय आयोजन है। इसमें देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा विदेशों से भी नाटक करने वाले आते हैं। मगर दिल्ली में मुख्य रूप से हिंदी के नाटक होते हैं।

अनेक रंग-समूह और व्यक्ति इसमें लगे हुए हैं। वे लगातार काम करते हैं, नाटक तैयार करते हैं, उसे प्रदर्शित करते हैं और दर्शक भी जुटते हैं। लेकिन ये तमाम रंग-समूह शौकिया तौर पर नाटक करने वाले लोगों के हैं और पेशेवेर तरीके से नाटक करने वालों की यहां कमी है। वास्तव में यहां कोई प्रोफशनल ग्रुप नहीं है।

इस दिशा में प्रयास करने की जरूरत है। यह देखना होगा कि कौन लोग अच्छा कर रहे हैं और कौन लोग अच्छा सकते हैं उन्हें हम आगे बढ़ाएं। इसमें सरकार के स्तर से प्रयास होना चाहिए। अनेक देशों में सरकारें ऐसा करती हैं। यहां भी सरकार काफी कुछ कर सकती है। एमसीडी भी कर सकती है। जहां तक दर्शकों की बात है तो यह स्पष्ट है कि इसका और सिनेमा का दर्शक वर्ग अलग-अलग है।

दोनों दो चीजें हैं, दो माध्यम हैं। सिनेमा के आने के बाद भी नाटक को पसंद करने वालों की कमी नहीं रही। युवा भी नाटक देखते हैं और बुजुर्ग भी। कुल मिलाकर लोगों की नाटक में रुचि है। इसको देखते हुए लगातार कार्यक्रम करना चाहिए। इसे और व्यापकता प्रदान की जानी चाहिए। पहली बार भारंगम के इतिहास में नाटककारों को भी बुलाया गया है। यह एक जरूरी चीज है। रंगकर्मी और नाटककार का जुड़ाव होना चाहिए। यह जुड़ाव नाटक के परिदृश्य को आगे बढ़ाएगा। यह एक सुखद पहल है। नाटक का परिदृश्य हिंदी में विकसित हो रहा है और यदि सकारात्मक माहौल बनता है तो इस विकास को और गति मिलेगी।
(धर्मेद्र सुशांत से बातचीत पर आधारित)

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