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उर्दू को रोजगार की भाषा बनाइए : नीतीश

पटना। हिन्दुस्तान ब्यूरो। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विद्वानों का आह्वान किया कि उर्दू को रोजगार की भाषा बनाइए। विचार-विमर्श कर नतीजा निकालिए कि उर्दू को मजबूती देने के लिए कौन से प्रोग्राम बनाये जाएं। उर्दू का कैसे प्रचार-प्रसार हो और इसे रोजगार से और कैसे जोड़ा जाय।

मुख्यमंत्री ने अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि उर्दू शिक्षकों के पदों को भरने के लिए योग्य शिक्षक नहीं मिल रहे हैं। इसकी वजह उर्दू का रोजगार से संबंध नहीं होना है। मंत्रिमंडल सचविालय द्वारा राजकीय प्रेमचंद रंगशाला में आयोजित दो दिवसीय जश्न-ए-उर्दू के उद्घाटन समारोह में उन्होंने ये बातें कही।

मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार ने उर्दू के विकास के लिए नई नीति बनाई है। इसके तहत राज्य के सारे स्कूलों में उर्दू शिक्षक नियुक्त करेंगे ताकि लोग उर्दू सीखें और जानें। पर उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति में दिक्कत आ रही है। पहले 200 नंबर उर्दू पर नियुक्ति करनी चाही, बहुत कम शिक्षक मिले। घटाकर 50 नंबर उर्दू कर दिया, तब भी टीचर नहीं मिले। जश्न-ए-उर्दू में एक डिबेट यह भी कीजिए, हम क्या करें कि हमें हर स्कूल के लिए उर्दू शिक्षक मिलें।

विद्वान समाधान निकाल कर दें, हमें अपनाने में कोई दिक्कत नहीं है। अपनी भाषा की बदौलत अधिक तरक्कती नीतीश कुमार ने कहा कि अपनी भाषा की बदौलत ज्यादा तरक्की होती है। हम अंग्रेजी के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन बात चल पड़ी है कि अंग्रेजी के बिना काम नहीं चलेगा। तो फिर लोगों को चुनाव में अंग्रेजी में वोट मांगना चाहिए। वहां तो हिन्दी, उर्दू, मैथिली, मगही, अंगिका में वोट मांगते हैं। यूपीएससी भी अंग्रेजी को लेकर वही कर रहा है।

उर्दू और हिन्दी को मिलकर विकल्प बनने का प्रयास करना चाहिये। जनता की भाषा में जो बातें होती है वह ज्यादा असर करती है। लोकतंत्र में काम जनता की भाषा में होना चाहिए। चीन, फ्रांस, जापान बिना अंग्रेजी भाषा के आगे बढ़ रहे हैं। उर्दू अकादमी 15 दिनों में उर्दू सिखा रही है। उर्दू साहित्यकारों को पुरस्कार दिये जा रहे है। उर्दू एक बार जब चल पड़ेगी तो उसे कौन रोकेगा? उर्दू इन्कलाब की भाषा उर्दू राज्य की दूसरी राजभाषा है।

हिन्दी-उर्दू सगी बहनें हैं। यहां की मिट्टी में इन दोनों भाषा का एकसाथ निवास है। देहात के लोग जो भाषा बोलते हैं उसमें भी उर्दू के शब्द भरे पड़े रहते हैं। ये किसी धर्म के मानने वालों की नहीं, सबों की भाषा है। यह परिवर्तन और इन्कलाब की भाषा रही है। गंगा जमुनी तहजीब की भाषा है। पटना लिटरेचर फेस्टविल में भी देसी भाषाओं पर जोर होगा। ऐसे कार्यक्रमों से अपनी भाषा पर नाज करने का मौका मिलता है।

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