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कठिन राह पर केजरीवाल

7/6 और 7/7, भगवान दास रोड, नई दिल्ली। इस हफ्ते की शुरुआत तक ये दो डुप्लेक्स फ्लैट दिलवालों की दिल्ली के लिए कोई मतलब नहीं रखते थे, पर सप्ताहांत तक ईंट और सीमेंट से बने ये बेजान भवन खबर बन गए। सूचना आई कि दिल्ली के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री इनमें से एक में रहेंगे। दूसरा उनका कैंप कार्यालय होगा। समाचार जंगल में आग की तरह फैला। वजह? लोगों को लगता था कि केजरीवाल साधारण ‘क्वार्टर’ में रहेंगे, दिल्ली के आम आदमी की तरह। पर यह तो आलीशान फ्लैट था! लाखों रुपये महीने के किराये वाला। बेचने चलो, तो करोड़ों मिल जाएं। कीमत और रहन-सहन के हिसाब से आम आदमी के सपनों से भी कोसों दूर। जाहिर है, हंगामा मचना था, मचा। अरविंद केजरीवाल हिल गए और फेसबुक पर घोषणा कर डाली कि मैं अब किसी छोटे फ्लैट में रहूंगा। उनके समर्थकों ने चैन की सांस ली। ‘हीरो’ की छवि पर छा उठी काली छाया छंट गई थी। हालांकि, कई सवाल अनुत्तरित रह गए।

अरसे से अरविंद घोषणा करते रहे हैं कि मैं बंगला नहीं लूंगा। लाल बत्ती नहीं लूंगा। सुरक्षा नहीं लूंगा। फिर विश्वास मत हासिल करते ही यह खुलासा क्यों हुआ कि वह आलीशान फ्लैट में रहने जा रहे हैं? इस तरह के फ्लैट तो सरकारी प्रभुवर्ग के लोगों को आवंटित किए जाते हैं। क्यों नहीं उन्होंने दो या तीन बेडरूम का क्वार्टर चुना? उनके सबसे सबल समर्थक इनमें ही रहते हैं। उनके सान्निध्य में रहकर मुख्यमंत्री जी को हर रोज उनके रंज-ओ-गम जानने का मौका मिलता। इससे उन्हें अपने वायदे पूरे करने में आसानी होती। अगर दबाव के बाद वह पीछे हटे, तो क्या यह प्रश्न नहीं जन्म लेगा कि उनका मन तो भगवान दास रोड पर रहने का था, पर प्रतिरोध के कारण फैसला बदलना पड़ा? ऐसे ही सवाल ‘आप’ के मंत्रियों की नई इनोवा गाड़ियों पर उठ रहे हैं। अगर सरकारी काम के लिए उन्हें गाड़ी की जरूरत थी, तो फिर इतनी महंगी सवारी क्यों? बाजार में सस्ते विकल्प भी मौजूद हैं।

हालांकि किफायती होने के बावजूद ‘आम आदमी’ की पहुंच से वे अभी काफी दूर हैं। इसलिए ‘आप’ के आलोचकों को यह कहने का मौका मिल गया कि हाथी के खाने के दांत और हैं और दिखाने के और। जाहिर है, अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों को आगे हर कदम नाप-तौलकर रखना होगा। लोगों ने उनसे आवश्यकता से अधिक उम्मीदें पाल रखी हैं। जरा-सी भी चूक इस नई नवेली पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है। उन्हें यह भी याद रखना होगा के सादगी के वे अकेले पालनहार नहीं हैं। भारत में जहां विलासी नेताओं की फौज रही है, वहीं सौभाग्यवश राजधर्म का समूची मर्यादा के साथ निर्वाह करने वाले भी हैं। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मानिक सरकार चौथी बार सत्ता में आए हैं। डेढ़ दशक से लंबी हुकूमत के बावजूद वह दो कमरों के अति साधारण मकान में रहते हैं। सरकार अपने दफ्तर पैदल चले जाते हैं और यदि सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल करना होता है, तो उस पर कोई लालबत्ती नहीं होती।

उनकी पत्नी राजकीय वाहन का इस्तेमाल करते नहीं देखी जातीं। और तो और, अपना समूचा वेतन और भत्ते वह ‘पार्टी फंड’ में जमा करवा देते हैं। सीपीएम की ओर से उन्हें पांच हजार रुपये महीना जेब खर्च दिया जाता है, जिससे उनकी गुजर-बसर होती है। गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर भी अपनी सादगी के लिए जाने और माने जाते हैं। थोड़ा अतीत में झांकें, तो कई दिलचस्प उदाहरण मिलते हैं। मैं उनमें से सिर्फ एक का जिक्र करना चाहूंगा। इंद्रजीत गुप्त संयुक्त मोर्चा की हुकूमत में गृह मंत्री हुआ करते थे। पद और गोपनीयता की शपथ लेते ही खुफिया अधिकारियों ने उन्हें सलाह दी कि वह गृह मंत्री के लिए तयशुदा बंगले में चलकर रहें। वजह बताई गई कि देश का गृह मंत्री होने के नाते उन पर तमाम तरह के खतरे आयद होते हैं और वेस्टर्न कोर्ट के जिस आवास में वह रहते आए हैं, वहां सुरक्षा का सरंजाम नहीं जुटाया जा सकता।

इंद्रजीत दा जिंदगी भर वामपंथ को ओढ़ते-बिछाते आए थे। उन्हें यह गवारा नहीं हुआ। वह आगे भी वेस्टर्न कोर्ट में रहते रहे। सवाल उठता है कि क्या अरविंद केजरीवाल ने इसी किस्म की व्यावहारिक मजबूरियों के चलते भगवान दास रोड के आलीशान डुप्लेक्स में रहना तय किया था? अगर यह सच है, तब भी उन्हें कई असुविधाजनक सवालों का सामना करना पड़ सकता है। एक और प्रश्न लोगों के जेहन को मथ रहा है। सत्ता संभालते ही नई दिल्ली की मौजूदा सरकार ने आनन-फानन में बिजली और पानी की दरों में कमी का ऐलान कर दिया। पर यह क्या? विधानसभा में उनका साथ देने वाली कांग्रेस और खुल्लमखुल्ला मुखालफत पर उतरी भाजपा, दोनों उनके जन-कल्याणकारी दावों की धज्जियां उड़ा रहे थे। इसीलिए इस आशंका के गुब्बारे में हवा भरी जा रही है कि नौसिखिया लोगों की यह सरकार कितने दिन अपने कौल पर कायम रह पाएगी? याद रखें। हुकूमत सिद्धांतों की तरह सहज और सरल नहीं होती। वह वायदों और अपेक्षाओं का अनोखा चक्रव्यूह भी है।

केजरीवाल और उनके साथी अपने दावे और वायदे सिरे तक पहुंचा पाते हैं या नहीं, इसके लिए हमें उन्हें कुछ वक्त देना होगा, पर एक बात चमकते हुए आईने की तरह साफ है। वह है ‘आप’ के लोगों की ईमानदारी और नेकनीयती। सवाल उठता है कि क्या देश को एक पारदर्शी, ईमानदार और साफ-सुथरी सरकार की जरूरत नहीं है? हमारे राजनेताओं में काबिलियत की नहीं, बल्कि इन तीन सद्गुणों की कमी पाई जाती रही है। यही वजह है कि अपने मतदाताओं का भरोसा उन्होंने रह-रहकर तोड़ा है। अगर केजरीवाल और उनके साथी इस माहौल को छह महीने भी बरकरार रखने में कामयाब हो जाते हैं, तो भारतीय राजनीति के इतिहास में कई चौंकाने वाले अध्याय जुड़ सकते हैं।

दिल्ली विजय के बाद टीम केजरीवाल की नजर लोकसभा चुनावों पर है। ‘आप’ कई प्रदेशों में चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि लोग राजनीति के मौजूदा चाल-चलन से नाखुश हैं। राष्ट्रीय दल रीति-नीति से एक-दूसरे की कार्बन कॉपी नजर आते हैं। सूबाई पार्टियों के हालात तो और भी खराब हैं। क्षेत्रीय दलों के प्राय: सभी क्षत्रपों पर तरह-तरह के आरोप हैं और इनके शीर्षस्थ नेता अपनी पार्टियों को निजी जागीर की तरह चलाते हैं। आप पूछ सकते हैं कि क्या ‘आप’ देश भर की आकांक्षाओं को नई राह दे सकती है? दिल्ली तो एक शहरी सूबा है, पर क्या पूरे देश में इतनी जल्दी कोई सियासी सैलाब खड़ा किया जा सकता है? कुछ राजनीतिक विश्लेषक दिलचस्प जवाब देते हैं कि 1977 में जनता पार्टी आनन-फानन में बनी थी। इसमें शामिल दलों में सामंजस्य नहीं था और ताजिंदगी वे एक-दूसरे से जूझते आए थे। इसके बावजूद जनता ने उन्हें चुना, क्योंकि मतदाता के पास अपना गम-गुस्सा दिखाने का यही मौका था। वोटर आज भी गमजदा है।

उसे कई सियासी चेहरों से शिकवे हैं। यही वह मुकाम है, जो ‘आप’ के लिए अवसर है और चुनौती भी। उन्हें मन, वचन, कर्म से अपनी नेकनीयती और परिणामों के प्रति प्रतिबद्धता दिखानी होगी। छोटी-सी भूल उन्हें राजनीति का धूमकेतु साबित कर सकती है। चाहे कुछ भी हो, पर इतना तय है कि लोकसभा का अगला चुनाव दिलचस्प होगा। कृपया इंतजार कीजिए।

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