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टाइगर हिल पर फहराया तिरंगा

नायब सूबेदार योगेंद्र सिंह यादव भारतीय सेना के जवान हैं। योगेंद्र सिंह को कारगिल युद्ध में उनकी शानदार बहादुरी के लिए देश के प्रतिष्ठित सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया जा चुका है। बॉलीवुड फिल्मों लक्ष्य और एलओसी कारगिल  में योगेंद्र यादव की दास्तां को परदे पर बखूबी दिखाया गया है। पेश हैं उनके एक भाषण के अंश-

देशसेवा का मौका
ईश्वर हर इंसान को जीवन में एक बार कुछ खास करने का मौका देता है। मेरे जीवन में भी ऐसा ही खास मौका आया। बात वर्ष 1999 की है। मैं अपने नए जीवन की शुरुआत कर रहा था। पांच मई, 1999 को मेरी शादी थी। मैं शादी के लिए अपने गांव गया था। 20 मई को जम्मू वापस ड्यूटी पर लौटा, तो पता चला कि मेरी बटालियन कारगिल कूच कर गई है। यह मेरे जीवन का एक सुनहरा पल था। यह वह पल था, जिसने मुझे अपने देश की सेवा करने का मौका दिया। मुझे गर्व है कि मेरा जन्म महान हिन्दुस्तान में हुआ। मुझे गर्व है अपने माता-पिता पर, जिन्होंने मुझे देश सेवा के लिए प्रेरित किया। हमें जंग के मैदान से खबरें मिल रही थीं। हमारे कई जवान शहीद हो चुके थे। इसी दौरान टाइगर हिल पर फतह करने के लिए घातक टुकड़ी का गठन किया गया। मुझे भी इस टुकड़ी में शामिल किया गया। सबसे अच्छी बात यह थी कि मुझे इस टुकड़ी में सबसे आगे चलने का मौका मिला। दो जुलाई को हमने टाइगर हिल के लिए चढ़ाई शुरू की। हम पांच जुलाई को इस पहाड़ी पर चढ़ गए। रास्ता बहुत कठिन था, बर्फीली आंधी चल रही थी, पर हमारे बुलंद हौसले के आगे हर मुश्किल आसान होती जा रही थी। हम सब कदम-से-कदम मिलाकर आगे बढ़ते जा रहे थे।

दुश्मन से मुकाबला
हम आगे बढ़ रहे थे, तभी दुश्मन सेना ने हमारे ऊपर फायरिंग शुरू कर दी। दोनों तरफ से फायरिंग शुरू हो गई। दुश्मन सेना के आठ जवान मारे गए। हम सिर्फ सात जवान थे, लेकिन हमारे हमलों से उन्हें लगा कि हम सात नहीं, बल्कि सात सौ हैं। इस बीच जब दुश्मन टुकड़ी थोड़ा करीब आई, तो उसे पता चल गया कि हम सिर्फ सात हैं। उन्होंने लौटकर अपने कमांडर को इसकी जानकारी दी। उन्होंने अपनी रणनीति बदली। आधे-घंटे बाद उन्होंने नारेबाजी शुरू कर दी। हमने तय किया कि जब वे थोड़ा करीब आएंगे, तो हम फायर करेंगे। इस बीच हमारे पास गोली-बारूद की कमी होने लगी थी। नीचे से सप्लाई नहीं हो पा रही थी। दोनों तरफ से फायरिंग जारी थी। जंग में हमारे छह साथी शहीद हो गए। वे खुद तो हमेशा के लिए सो गए, पर शहीद होने से पहले उन्होंने दुश्मन सेना के 35 सैनिकों को मार गिराया।

दुश्मन का रवैया
मेरे शरीर से खून बह रहा था, मैं गंभीर रूप से घायल था। पर मुझे दर्द का तनिक भी एहसास नहीं था। उस समय मेरे जेहन में सिर्फ तिरंगा लहरा रहा था। साथियों के शव चारों तरफ पड़े थे। तभी दुश्मन सेना के सैनिक वहां आए। हमारे शहीदों के शवों पर वे दोबारा गोलियों की बौछार करने लगे। उन्होंने हमारे शहीदों के शवों को बूट से धक्का दिया। वे हमें गालियां भी दे रहे थे। मैंने उन्हें बात करते सुना। उनके अफसर ने हमारी चौकी को नष्ट करने का आदेश दिया था। मैं चुपचाप पड़ा रहा। उन्हें एहसास भी नहीं हुआ कि मैं जीवित हूं। मैंने ईश्वर से प्रार्थना की कि मुझे बस इतनी देर के लिए जीवित रखो कि मैं नीचे चौकी तक जाकर अपने साथियों को दुश्मन के इरादों की जानकारी दे सकूं।

मैं बच गया
इस दौरान दुश्मन सेना के अफसर ने अपने साथियों से कहा कि शवों के पास मौजूद राइफलें ले आओ। उन्होंने हमारी राइफलें उठाईं और दोबारा शवों पर गोलियों की बौछार कर दी। उन्होंने मेरे ऊपर भी गोली चलाई। उन्होंने मेरी छाती पर गोली मारी। लेकिन मेरी शर्ट की ऊपरी जेब में पर्स था। उस पर्स में सिक्के थे। दुश्मन की गोली सिक्कों से टकराकर वापस हो गई और मैं बच गया। शायद ईश्वर की यही मर्जी थी, वह मेरी जान बचाना चाहता था। दुश्मन हमारी राइफलें लेकर भागे। मेरे पास एक हथगोला बचा था। मैंने दुश्मनों पर हथगोला फेंक दिया। उसके फटते ही दुश्मनों में खलबली मच गई। उन्होंने कहा कि नीचे से भारतीय फौज आ गई, पर किसी ने कहा कि शायद सात में से कोई जवान जीवित बच गया हो। तभी मैंने पास में पड़ी एक राइफल देखी। मेरा एक हाथ बेकार हो चुका था, मैंने दूसरे हाथ से राइफल उठाई और उनके चार जवानों को मार गिराया। मैंने उठने की कोशिश की और घूमकर चारों तरफ से फायरिंग कर दी। उन्हें लगा कि नीचे से फौज आ गई है। वे भाग गए।

टाइगर हिल फतह
मैंने अपने साथियों के शवों को गौर से देखा, मुझे लगा कि शायद इनमें से कोई मेरी तरह जीवित बचा हो। पर वे सब शहीद हो चुके थे। मैंने नीचे की चौकी पर पहुंचने का फैसला किया, ताकि दुश्मनों के इरादे विफल कर सकूं। मैं एक नाले के सहारे नीचे लुढ़क गया, यह सब काफी मुश्किल था। नीचे आते ही मैंने अपने कुछ साथियों को देखा। मैंने कमांडर को आवाज दी। मेरा एक हाथ टूट गया था, पूरी पोशाक चिथड़े-चिथड़े हो चुकी थी। मेरी हालत देखकर उन्हें लगा कि मैं बच नहीं पाऊंगा। मैंने उनसे कहा, सर यहां हमला होने वाला है। उन्होंने तुरंत इसकी सूचना सीओ को दी। मेरा फस्र्ट एड हो चुका था, लेकिन खून बहना जारी था। सीओ साहब के पास पहुंचने तक शाम के सात बज चुके थे। उस समय मैं बोल पा रहा था, लेकिन आंखों से कुछ दिख नहीं रहा था। मैं अपने अधिकारी को पहचान नहीं पाया। पर मैंने उनको ऊपर की सारी घटना बता दी। उन्होंने तुरंत रणनीति बनाई, जवानों को तैयार किया और उसी रात हमने टाइगर हिल पर फतह का तिरंगा फहरा दिया।
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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