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शहर में साहित्य की तलाश

साहित्य से उनका संग-साथ इतना आत्मीय हो चला था कि उन्हें लगता कि साहित्य हमेशा उनके संग-संग रहता है। कभी लगता कि साहित्य उनकी छाया है। कभी लगता कि साहित्य उनकी काया है। कभी लगता कि साहित्य उनका तकिया है, उनकी चारपाई है, उनका बिछौना है और उनका पापोश है। वह जिधर भी देखते, वह दिशा साहित्यिक हो उठती। वह साहित्य जीते थे और उनकी असली ख्वाहिश थी कि वह जिस तरह से साहित्य में जिए हैं, उसी तरह साहित्य में मरें भी। वह मानते थे कि वह जिस जगह होते हैं, साहित्य वहीं से शुरू होता है। वह अगर घर में होते, तो साहित्य में होते। साहित्य उन्हें चारों ओर से घेरे रहता। वह भी साहित्य को चारों ओर से घेरे रहते। वह हवा-पानी के लिए कभी बाहर निकलते, तो सब कुछ असाहित्यिक लगने लगता।

वह साहित्य के लिए शहर-शहर भटकते रहते। शहर  उनके लिए भटका करते। वह शहर को बुलाते। शहर उन्हें बुलाते। वह मानकर चलते थे कि जिधर देखेंगे, साहित्य ही दिखेगा। वह मानते थे कि जहां शहर है, वहां साहित्य है       और इससे भी आगे जहां वह हैं, वहां साहित्य को होना ही है। शहर में उतरते ही वह उसमें साहित्य का पता ढूंढ़ने निकल पड़ते। उन जगहों पर जाते, जहां कभी साहित्य का पता हुआ करता था। जब उन जगहों पर कुछ और मिलता, जैसे कहीं दुकान मिलती, कहीं तबेला मिलता और कहीं मोबाइल की दुकान मिलती, नए लड़के-लड़कियां मिलते, जो उन्हें पहचानते तक न थे, तो आहत होकर वह कहते- इस शहर को आखिर क्या हो गया है? क्या साहित्य मर गया है? वह सोचकर जाते कि इस घर में कम से कम साहित्य तो होगा ही। उनकी पुकार पर निकलेगा, संग बैठेगा।

दरवज्जे की कुंडी खटखटाने या घंटी बजाने पर भी जब साहित्य बाहर नहीं निकलता, तो वह बहुत निराश होते और कहते- देखो, आज इस घर, इस मुहल्ले, इस शहर, इस राज्य और राष्ट्र में साहित्य नहीं रहा। जीवन असाहित्यिक होने लगा है। एक बार अपने भैया जी इलाहाबाद गए, तो एक मकान के आगे खड़े होकर कहने लगे: दूध है? जब दूध न मिला, तो कहने लगे कि देखो तो दूध है, लेकिन नाथ नहीं है! बिना नाथ के दूध बेकार है। इस अरसिक हो चुके इलाहाबाद में अब रस-रंजन किसके साथ करूं? चल खुसरो घर आपने रैन भई चहु देस!  इसी तरह, वह जब-जब अपने शहर जाते, तो वहां के चेंज को देखकर कह उठते कि क्या करें, किसके साथ शाम गुजारें? वह अपने शहर जाते और शहर के साहित्य जी न मिलते, तो चीख उठते थे कि यह शहर अब रसातल को जा रहा है। बचा क्या है? बताइए फलां जी नहीं हैं? वह शहर को उसके साहित्य से जानते। अगर वह मिलता, तो शहर होता, वरना मसान कहाता।

उनके लिए साहित्य को हमेशा उसी तरह अपनी जगह होना था, जिस तरह वह सोचते होते। जब साहित्य नहीं मिलता, तो वह नाराज होते। साहित्य की ये मजाल कि वह आएं और वह दरवाजा तक न खोले। वह अपनी जगह मिलता, तो वह उस शहर को साहित्य मानते। शहर की जनता से उनका कोई मतलब नहीं होता। शहर में लोग भी रहते हैं, वह ऐसा मानते ही नहीं थे। उनके लिए या तो वे होते या साहित्य होता। हमें तो लगता है कि उन्हें साहित्य का सरसांव हो गया है। उठते-बैठते सोते-जागते वह साहित्य-साहित्य करते रहते हैं। रघुवीर सहाय ने कहा है कि जहां बहुत कला होगी, वहां कला न होगी। इसी तरह जहां बहुत साहित्य होगा वहां..।

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