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बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे सी रामचंद्र

बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे सी रामचंद्र

[पुण्यतिथि 5 जनवरी के अवसर पर]
बॉलीवुड में सी रामचंद्र का नाम एक ऐसी शख्सियत के तौर पर याद किया जाता है, जिन्होंने न केवल संगीत निर्देशन की प्रतिभा से, बल्कि गायकी, फिल्म निर्माण-निर्देशन और अभिनय से भी सिने प्रेमियों को अपना दीवाना बनाये रखा।

फिल्म जगत में 'अन्ना साहब' के नाम से मशहूर रामचंद्र से फिल्मों से जुड़ी कोई भी विधा अछूती नहीं रही। वर्ष 1918 में महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के एक छोटे से गांव पुंतबा में जन्मे सी रामचंद्र का रुझान बचपन से ही संगीत की ओर था। उन्होंने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा गंधर्व महाविद्यालय के विनाय कबुआ पटवर्धन से हासिल की।

रामचंद्र ने अपने सिने करियर की शुरुआत बतौर अभिनेता यूभी राव की फिल्म नागानंद से की। उसी दौरान उन्हें मिनर्वा मूवीटोन की निर्मित कुछ फिल्मों में अभिनय करने का मौका मिला। तभी उनकी मुलाकात महान निर्माता-निर्देशक सोहराब मोदी से हुयी। सोहराब ने रामचंद्र को सलाह दी कि यदि वह अभिनय के बजाय संगीत की ओर ध्यान दें तो फिल्म इंडस्ट्री में सफल हो सकते हैं।

इसके बाद सी रामचंद्र मिनर्वा मूविटोन के संगीतकार बिंदु खान और हबीब खान के ग्रुप में शामिल हो गये और बतौर हारमोनियम वादक काम करने लगे। बतौर संगीतकार उन्हें सबसे पहले एक तमिल फिल्म में काम करने का मौका मिला।

वर्ष 1942 में प्रदर्शित फिल्म सुखी जीवन की सफलता के बाद रामचंद्र कुछ हद तक बतौर संगीतकार फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल रहे। चालीस के दशक में सी रामचंद्र ने संगीतकार के रूप में जिन फिल्मों को संगीतबद्ध किया उनमें सावन, शहनाई, पतंगा, समाधि एवं सरगम प्रमुख रही।

वर्ष 1951 में सी रामचंद्र को भगवान दादा की निर्मित फिल्म अलबेला में संगीत देने का मौका मिला। फिल्म अलबेला में अपने संगीतबद्ध गीतों की कामयाबी के बाद रामचंद्र बतौर संगीतकार फिल्मी दुनिया में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गये। यूं तो फिल्म अलबेला में उनके संगीतबद्ध सभी गाने सुपरहिट हुये लेकिन खासकर शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के, भोली सूरत दिल के खोटे नाम बड़े और दर्शन छोटे, मेरे पिया गये रंगून किया है वहां से टेलीफून ने पूरे भारत वर्ष में धूम मचा दी।

वर्ष 1953 में प्रदीप कुमार, बीना राय अभिनीत फिल्म अनारकली की सफलता के बाद रामचंद्र शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुंचे। फिल्म अनारकली में उनके संगीत से सजे ये गीत जाग दर्दे इश्क जाग, ये जिंदगी उसी की है.. श्रोताओं के बीच आज भी लोकप्रिय हैं।

वर्ष 1953 में रामचंद्र ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रखा और न्यू सांई प्रोडक्शन का निर्माण किया, जिसके बैनर तले उन्होंने झंझार, लहरें और दुनिया गोल है जैसी फिल्मों का निर्माण किया, लेकिन दुर्भाग्य से इनमें से कोई भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुयी, जिससे उन्हें काफी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा।

इसके बाद उन्होंने फिल्म निर्माण से तौबा कर ली और अपना ध्यान संगीत की ओर लगाना शुरू कर दिया। वर्ष 1954 मे प्रदर्शित फिल्म नास्तिक में उनके संगीतबद्ध गीत देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान कितना बदल गया इंसान.. समाज में बढ़ रही कुरीतियों पर उनका सीधा प्रहार था। पचास के दशक में स्वर साम्राग्यी लता मंगेश्कर ने संगीतकार रामचन्द्र की धुनों पर कई गीत गाये।

फिल्म अनारकली के गीत ये जिंदगी उसी की है, जाग दर्दे इश्क जाग.. जैसे गीत इन दोनों फनकारों की जोड़ी की बेहतरीन मिसाल हैं।

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