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टूटे मौन का चुनावी स्वर

अपने कार्यकाल के अंतिम साल और शायद अंतिम संवाददाता सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भाव-भंगिमा, घोषणा, दलील, सफाई और उनके दावे वैसे ही थे, जैसे संप्रग सरकार की शुरुआत में थे। कम से कम संप्रग-दो की शुरुआत और अंतिम वर्ष में वह एक समान ही नजर आए। ऐसे में, इस संवाददाता सम्मेलन में क्या था, जिसका इंतजार मीडिया व लोगों को रहा? दरअसल, इस मंच का इस्तेमाल उन्होंने अपने संदर्भ में कुछ घोषणाओं के लिए किया और साथ ही, अपनी स्थिति स्पष्ट की। सबसे ‘बड़ी घोषणा’ यह कि आम चुनाव के बाद वह प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। यानी मनमोहन सिंह बतौर प्रधानमंत्री अपना तीसरा कार्यकाल नहीं चाहते। एक अर्थ में यहां यह जुमला सटीक बैठता है कि मजबूरी का नाम महात्मा गांधी, क्योंकि संप्रग-तीन की सरकार बनने के आसार बेहद कम होते दिख रहे हैं। हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी को बहुत बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा है। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस बड़ी घोषणा के साथ तीन चीजें स्पष्ट कर दीं, जो मौजूदा राजनीति को दिलचस्प बना जाती हैं। पहली, आम चुनाव से पहले उन्होंने कांग्रेस के अंदर और बाहर की सियासी अनिश्चितता पर विराम लगाने का काम किया है। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि अगले कुछ महीनों में मैं अपनी जिम्मेदारी नए प्रधानमंत्री को सौंप दूंगा और यह उम्मीद करता हूं कि वह संप्रग का ही प्रधानमंत्री होगा।

दूसरी, इसी ऐलान से उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अंतिम पांच महीने तक वही देश के प्रधानमंत्री रहेंगे। इस संवाददाता सम्मेलन से पहले तक यह कयास लग रहा था कि ‘बड़ी घोषणा’ के तौर पर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते हैं और बाकी के कार्यकाल के लिए राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है। अब यह अटकल सिरे से खारिज हो गई है। तीसरी, उन्होंने कहा कि सुधार कार्यक्रम नहीं, प्रक्रिया है, जो चलती रहेगी। इससे यह जाहिर होता है कि बाकी बचे महीनों में भी सरकार अपना काम करेगी। लेकिन इस मामले में प्रधानमंत्री स्वयं बहुत आश्वस्त नजर नहीं आए। इसकी एक वजह हो सकती है कि जब इतने वर्षों में कई वायदों पर अमल नहीं हुआ, तो अब इसके पूरे होने की संभावना न के बराबर ही है।

इन तीन चीजों का जो कुलजमा है, वह कहीं-न-कहीं राहुल गांधी के लिए रास्ता बनाता है। मनमोहन सिंह स्वयं कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होने के लिए राहुल गांधी में पर्याप्त योग्यता है।’ लेकिन एक क्षण के लिए ठिठक कर सोचिए, अगर प्रधानमंत्री ‘बड़ी घोषणा’ नहीं करते, तब क्या राहुल के लिए ऐसा रास्ता बनता? कांग्रेस के लिए यह कठिन होता कि वह अपने प्रधानमंत्री के रहते अगले कार्यकाल के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम ऐलान करती। यह एक ‘राजनीतिक गलती’ होती, जिसे करने की आशंका एक इतनी पुरानी राष्ट्रीय पार्टी को लेकर नहीं की जा सकती। ऐसे में, देखा जाए तो मनमोहन सिंह ने राहुल गांधी के लिए आगे का रास्ता आसान कर दिया है।

एक सवाल के जवाब में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाना देश के लिए विध्वंसकारी होगा। इसी से मिलते-जुलते एक अन्य प्रश्न पर वह कहते हैं कि ‘.. अगर मजबूत प्रधानमंत्री का मतलब यह समझते हैं कि आप अहमदाबाद की सड़कों पर निर्दोष नागरिकों की सामूहिक हत्या करवाएं, यदि यही शक्ति का मूल्यांकन है, तो मैं नहीं मानता कि देश को इस तरह की ताकत चाहिए।’ यहां सवाल उठता है कि एक शांत, विनम्र प्रधानमंत्री को नरेंद्र मोदी पर इतना गुस्सा क्यों आता है? इसकी दो वाजिब वजहें हो सकती हैं। पहली, भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने मौजूदा प्रधानमंत्री पर कई व्यंग्य कसे हैं, उन पर फब्तियां की हैं और व्यक्तिगत रूप से अनेक बार आक्रमण बोला है। जैसे, ‘वह एक कमजोर प्रधानमंत्री हैं,’ ‘देश को मजबूर नहीं, मजबूत प्रधानमंत्री चाहिए’, ‘दस जनपथ के इशारे पर चलने वाले पीएम’ वगैरह-वगैरह। ऐसे में, पीएम का गुस्सा उन शब्दबाणों का जवाब है।

दूसरी, अपने पत्रकारिता-जीवन में शायद मैंने यह पहले कभी नहीं देखा कि किसी वर्तमान प्रधानमंत्री पर पत्रकारों ने इतने आक्रामक, तीखे और सीधे-सीधे सवाल दागे। देश में जो नकारात्मक माहौल बना है या विपक्षी पार्टियों ने महंगाई, भ्रष्टाचार, अर्थव्यवस्था की खराब हालत को चुनावी मुद्दे बनाए हैं, उनका गुस्सा प्रमुख विपक्षी पार्टी पर फूटना ही था, सो फूटा। उन्होंने कहा भी कि मैं नहीं मानता कि मैं कमजोर प्रधानमंत्री हूं। मुझे पूरा विश्वास है कि समकालीन मीडिया या विपक्ष की तुलना में इतिहास इस मामले में मुझ पर मेहरबानी बरतेगा। ..परिस्थितियों के हिसाब से मैं जो भी कर सकता था, उसमें सबसे अच्छा किया। मैंने क्या किया और क्या नहीं, इसका इंसाफ इतिहास करेगा। सरकार की उपलब्धियों को गिनाने के साथ-साथ उन्होंने अंतत: कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का शुक्रिया अदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह धारणा लगातार मजबूत हो रही थी कि पार्टी और सरकार के बीच मतभेद है। शक्ति के दो केंद्रों को लेकर भी सवाल उठ रहे थे। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह कहकर सभी को शांत कर दिया कि यह सरकार संप्रग की है और कांग्रेस इसका मुख्य घटक है, उसी के अनुसार चलना चाहिए।

संगठन, पार्टी और सरकार को बल प्रदान करने के लिए उन्होंने सोनिया गांधी की तारीफ की। लेकिन यहीं सवाल उठता है कि कहीं इन सब में वह आम चुनाव के बाद अपने लिए सक्रिय राजनीति की जमीन तो तलाश नहीं रहे हैं? या फिर वह राजनीति को अलविदा कहकर आत्मकथा लिखेंगे? कांग्रेस अध्यक्ष की तारीफ या संगठन की मजबूती की बात के पीछे कहीं उनके मन की कोई इच्छा तो नहीं छिपी है? क्या वह आगे कोई और किरदार चाहते हैं? जवाब भविष्य में है। पत्रकारों के सवालों के जवाब के दौरान प्रधानमंत्री बेहद संतुलित दिखे। यह सवाल कि आप इतना चुप क्यों रहते हैं, इस पर वह कहते हैं कि जब जरूरी होता है, तब मैं बोलता हूं। चाहे समय अच्छा रहा हो या बुरा, उनके व्यक्तित्व को यह सवाल परिभाषित करता है। साल में एकाध बार अपनी चुप्पी तोड़ने वाले प्रधानमंत्री ‘बंद मुट्ठी सवा लाख की’ कहावत कैसे चरितार्थ होती है, इसे साबित करने में अपने राजनीतिक गुरु नरसिंह राव से भी आगे निकल गए। दो कार्यकाल, यानी वह दस साल बतौर प्रधानमंत्री पूरा करने जा रहे हैं। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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