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अब भी उसे दामिनी या निर्भया ही क्यों कहें

पिछले दिनों कोलकाता में बलात्कार की घटना हुई, तो पीड़िता को मीडिया में कुछ ने दामिनी और निर्भया कहा। ये वही नाम हैं, जो दिसंबर 2012 में दिल्ली में एक लड़की के साथ चलती बस में सामूहिक बलात्कार के बाद पीड़िता के लिए इस्तेमाल हुए थे। उस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस साल भी उस दुखद घटना की याद में बहुत कुछ हुआ, लेकिन वह लड़की भुला दी गई, हालांकि उसे देवी का दर्जा दे दिया गया। सच तो यह है कि हम स्त्रियों को बराबरी का दर्जा नहीं दे सकते हैं। उन्हें तो साधारण मनुष्य की गरिमा देना भी हमें गवारा नहीं। लेकिन देवी, दुर्गा या काली कहकर उनकी पूजा कर सकते हैं। मिथक और इतिहास के बाहर सामान्य जीवन में जब स्त्रियां असामान्य शारीरिक और मानसिक क्षमता का परिचय देती हैं, तो हम इसे नजरअंदाज कर देते हैं। जब मामला नजरअंदाज करने लायक नहीं रह जाता है, तो फट-से उसे देवी बनाकर पूजना शुरू कर देते हैं। बलात्कार पीड़िता के मामले में भी कहीं हम इस लड़की की वास्तविक पहचान भुलाकर इसी पुरानी कहानी को तो नहीं दुहरा रहे हैं? उसकी वास्तविक पहचान छिपाने के पीछे तर्क यह है कि पीड़िता का नाम उजागर होने से उसके बदनाम होने का खतरा है।

ऐतराज इसी तर्क पर होना चाहिए। स्त्रियां मर्दों की दरिंदगी का शिकार होती रही हैं। वे अपनी मर्जी से बलात्कार या शारीरिक-मानसिक दुर्व्यवहार को आमंत्रित नहीं करती हैं। मगर मर्दवादी सोच के दायरे में जो दरिंदगी का शिकार है, वह बदनाम हो जाता है और दरिंदगी को अंजाम देने वाला नहीं। दरिंदगी व वहशीपन उसे और ज्यादा मर्द होने का प्रमाण पत्र देता है। इसलिए देखें, तो ऐसे दरिंदे या वहशी जब पकड़े जाते हैं, तो जेल या कचहरी जाते समय उनके चेहरों पर ग्लानि या अपराध बोध नहीं, बल्कि एक तरह का गुरूर टपकता रहता है। जो दरिंदगी का शिकार होती है, उसका नाम इस तर्क से पोशीदा रखा जाता है कि वह बदनाम हो जाएगी। उसका सामाजिक जीवन मुश्किल हो जाएगा। उसका पति उससे नफरत करने लगेगा, उसका प्रेमी उससे मुंह मोड़ लेगा, उसका बेटा हीन  ग्रंथि से ग्रसित हो जाएगा।

सिर्फ इसलिए कि सामान्य मर्दवादी सोच यही है कि ऐसे मामलो में स्त्रियां ही असली दोषी होती हैं। वे चाहे किसी वहशीपन या दरिंदगी का शिकार ही क्यों न हों। किसी भी तरह स्त्री की देह प्रभावित हुई है, तो वह संदेह के घेरे में आ जाती है। और तो लंका विजय के बाद यही सीता के साथ भी हुआ था। इस सोच को इस कदर सामाजिक स्वीकार्यता मिली कि इसे कानून का दर्जा दे दिया गया है। ऐसे मामलों में शिकार को ही दोषी मान लेने की मानसिकता के कारण एक लड़की जिसने अपनी जान गंवा दी, मरने के बाद उसे अपनी पहचान भी गंवानी पड़ रही है। क्या यह उचित नहीं है कि अब उसकी पहचान को सामने लाया जाए?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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