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तनाव तो मेहमान है

चाय पर उनके पुराने साथी चले आए। कुछ देर बोर होने के बाद बोले, ‘अरे कभी मुस्करा भी लिया करो। कितना अच्छा चेहरा है, लेकिन बिगड़ा ही रहता है। यह तनाव तुम्हें कहां ले जाएगा?’  तनाव से बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है। डॉ. मोनिका फ्लेशनर का मानना है कि तनाव कोई दिक्कत नहीं है। बस उसे ‘क्रॉनिक’ नहीं होना चाहिए। वह मशहूर न्यूरो इम्युनोफिजियोलॉजिस्ट हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ कोलाराडो से जुड़ी हैं। दरअसल, थोड़ा-थोड़ा तनाव तो अच्छा होता है। तनाव दिक्कत तब बनता है, जब वह हमसे चिपक जाता है। चिपक जाने का मतलब यह है कि तनाव को आते-जाते रहना चाहिए। वह एक किस्म का मेहमान है। थोड़ा टेढ़े किस्म का मेहमान। अब मेहमान तो मेहमान है न। उसे जल्द-से-जल्द चले जाना चाहिए। मेहमान का टिककर बैठ जाना अच्छा नहीं होता।

अब जिस तरह मेहमान का टिक जाना सहज नहीं होता, उसी तरह तनाव के साथ भी है। वह आए, लेकिन टिक नहीं जाए। उसका आना एक चुनौती होता है। यह चुनौती हमें अच्छा खासा ‘रिफ्रेश’ कर जाती है। लेकिन जब तनाव अड़ जाता है, तो हमें अंदर से सोख लेता है। अंदर ही अंदर हम टूटने लगते हैं। उसका असर अक्सर हमारी चिड़चिड़ाहट में दिखलाई पड़ता है। होता यह है कि हम हर हाल में असहज नजर आते हैं। हम जब असहज होते हैं, तो ठीक से काम नहीं कर पाते। अक्सर बेहतरीन काम अपनी सहजता में ही होता है। सहज होने पर काम एक बहाव में होता है। असहज होकर हम बस किसी तरह काम को कर पाते हैं या उसे बस ढो पाते हैं। तनाव हमारी जिंदगी का हिस्सा है। यह कहना आसान है कि हमें तनाव नहीं होना चाहिए। यह मुमकिन नहीं है। तनाव तो रहेगा, लेकिन हमें उससे बच निकलना है। अब कैसे निकलना है? इसकी राह भी हमें ही तलाशनी है।

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