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येदियुरप्पा की वापसी

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की भारतीय जनता पार्टी में वापसी के बारे में खबरें काफी पहले से आ रही थीं, लेकिन अब येदियुरप्पा ने अपनी कर्नाटक जनता पार्टी के भाजपा में विलय की औपचारिक घोषणा कर दी है। इसके पहले कर्नाटक भाजपा के नेताओं ने औपचारिक तौर पर येदियुरप्पा से मिलकर उन्हें भाजपा में आने का न्योता दिया। यह कर्नाटक भाजपा और येदियुरप्पा, दोनों के लिए अच्छी खबर है, क्योंकि एक-दूसरे के बगैर दोनों प्रभावहीन हो चुके थे। दक्षिण के एकमात्र राज्य कर्नाटक में भाजपा ने पहली बार अपनी सरकार बनाई थी, उस सरकार के बनने में येदियुरप्पा सबसे महत्वपूर्ण नेता थे। येदियुरप्पा जमीनी नेता हैं और कर्नाटक की ताकतवर जाति लिंगायत का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक ओर येदियुरप्पा ने लिंगायतों को भाजपा से जोड़ा, तो दूसरी ओर लौह खदानों के जरिये अमीर बने रेड्डी बंधुओं ने अपनी ताकत जोड़ी। इसमें कुछ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का छौंक लगाने से भाजपा की सरकार बन गई, लेकिन सत्ता में आने के बाद  रेड्डी बंधुओं और येदियुरप्पा के बीच ठन गई, क्योंकि रेड्डी बंधु लगभग समानांतर सरकार चला रहे थे।

भाजपा के कुछ अन्य नेता भी येदियुरप्पा के खिलाफ थे, जो दिल्ली से उन्हें अस्थिर करने की कोशिश करते रहे। इस घटनाक्रम में सरकार का ढांचा बिखर गया और भाजपा फिर वहीं पहुंच गई, जहां से उसने अपनी यात्रा शुरू की थी।
येदियुरप्पा की वापसी से भाजपा को काफी असुविधाजनक सवालों का जवाब देना पड़ेगा, क्योंकि भाजपा इस वक्त केंद्र की संप्रग सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुद्दे पर संघर्ष करती दिख रही है। लेकिन भाजपा ने व्यावहारिक राजनीति के तकाजों को महत्व दिया है और नैतिक असुविधा ङोलना स्वीकार किया है। इसकी वजह यह है कि येदियुरप्पा की वापसी से शायद कर्नाटक में भाजपा चुनावी अखाड़े में कुछ बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर सकती है। येदियुरप्पा की कर्नाटक जनता पार्टी पिछले विधानसभा चुनावों में कोई खास झंडे नहीं गाड़ पाई, लेकिन आज भी वहां लिंगायतों के सबसे बड़े नेता येदियुरप्पा ही हैं और उनके बाहर रहने पर भाजपा की पहली पंक्ति में ऐसा कोई जमीनी नेता भी नहीं था। येदियुरप्पा ने भी यह देख लिया है कि भाजपा के बाहर रहकर उनकी हैसियत कुछ सीटों पर वोट काटने वाले नेता की ही रहती है, लेकिन अगर ये वोट न कटते, तो विधानसभा चुनाव में भाजपा की हालत शायद उतनी खराब न होती।

इसके बावजूद पिछले चुनावों में भाजपा का सफाया सिर्फ वोटों का समीकरण गड़बड़ होने से नहीं हुआ था। भाजपा सरकार आम तौर पर भ्रष्टाचार और अपने कुशासन के लिए बदनाम हो चुकी थी और पार्टी में सिर-फुटव्वल ने अराजकता का माहौल बना दिया था। इसलिए यह भी देखने की बात होगी कि येदियुरप्पा के शासनकाल की यादें क्या आम जनता के जेहन में अब भी हैं या वह उन्हें एक और मौका देने को तैयार है। यह ठीक है कि अगले लोकसभा चुनावों में येदियुरप्पा के होने से राष्ट्रव्यापी स्तर पर भाजपा के भ्रष्टाचार विरोधी प्रचार में कुछ कठिनाई हो सकती है, लेकिन अगर कर्नाटक से उसका विधानसभा की तरह ही सफाया हो जाए, तो केंद्र में सरकार बनाने की उसकी इच्छा को काफी धक्का लगेगा। येदियुरप्पा प्रकरण वही बात साबित करता है, जो आम जनता ठीक से जानती है कि भ्रष्टाचार का मुद्दा सभी पार्टियों के लिए सिद्धांत का नहीं, सुविधा का मुद्दा है। येदियुरप्पा खुद तो 2014 में लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे, ऐसा बताया गया है, लेकिन इन चुनावों में उनके होने से भाजपा को कितना फायदा होगा, यह देखने की बात है।

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