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खूनी शुरुआत

बुधवार को जब पूरी दुनिया जश्न मनाकर 2014 के आने का स्वागत कर रही थी, तब क्वेटा में आत्मघाती विस्फोट के दर्द के साथ पाकिस्तान नए साल में अपने कदम रख रहा था। बलूचिस्तान के बाहरी इलाके में विस्फोटकों से भरी एक गाड़ी शिया जियारतियों की बस से टकरा दी गई, जिसमें गुरुवार की रिपोर्ट के मुताबिक तीन लोग मारे गए और कई सारे जख्मी हो गए। इस बर्बरता ने यह जता दिया है कि तारीखें बदलती रहें और हिंसा के आंकड़े ऊपर-नीचे होते रहें, मगर पाकिस्तान में मजहबी कट्टरता और दहशतगर्दी का दौर खत्म होता नहीं दिख रहा और सोसायटी के आगे इनका खतरा बदस्तूर बना रहेगा। यह वाकया बताता है कि दहशतगर्दों को अपने किए का कोई अफसोस नहीं और वे अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए मासूम और बेगुनाह लोगों के खून सड़कों पर बिखेरते रहेंगे और शिया-सुन्नी फसाद के शोले भड़काते रहेंगे। सदर-ए-पाकिस्तान और वजीर-ए-आजम ने इस घटना पर तकलीफ का इजहार किया है, मगर अफसोस और गुस्सा जताने से कहीं ज्यादा कुछ करने की जरूरत है, ताकि वे कातिल बेअसर हो सकें, जिन्होंने इस मुल्क को खून से भिगोया है।

पिछले एक-दो साल से बलूचिस्तान की सड़कें दहशतगर्दों के लिए खुले मैदान में तब्दील हो गई हैं, जिन पर वे अपने वहशी कारनामों को अंजाम देते रहे हैं। हालांकि सूबे की नई हुकूमत ने हिफाजती इंतजामात को मुस्तैद बनाने की कोशिश की है, मसलन बसों के लिए स्कॉर्ट का इंतजाम किया गया है, मगर इससे अधिक ठोस पहल की दरकार है। क्योंकि जहां फिदाइन हमलों का जोखिम हो, वहां स्कॉर्ट में लगी गाड़ियां कुछ नहीं कर सकतीं। जरूरत यह है कि समस्या की जड़ों पर हमले किए जाएं। हिफाजती इदारों को मालूम है कि बलूचिस्तान में सक्रिय सांप्रदायिक दहशतगर्दों से कैसे निपटा जा सकता है। एक चौकस खुफिया तंत्र के सहारे आतंक के बुनियादी ढांचे को तहस-नहस करके ही इन्हें रोका जा सकता है। यह ठीक है कि बलूचिस्तान में जारी दहशतगर्दी रातोंरात खत्म नहीं होगी, लेकिन इंतजामिया के लोग अगर सही चश्मे से इसे नहीं देखेंगे, तो ऐसे हादसे होते रहेंगे।
द डॉन, पाकिस्तान

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