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राहत पर राजनीति

भयंकर सर्दी में मुजफ्फरनगर के राहत शिविरों से पीड़ितों को हटाने का काम शुरू हो चुका है। जाने किसके भरोसे ये लोग सर्दी काटेंगे और खाएंगे-पिएंगे? सचमुच उत्तर प्रदेश में गंदी राजनीति अपनी चरम-सीमा पर है। हर कोई राजनीतिक रोटियां सेंक रहा है। राजनीतिक दलों से लेकर अल्पसंख्यकों के नेता तक और नौकरशाहों से लेकर छोटे-मोटे संगठन तक। हाल ही में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने राहत शिविर में रहने वालों को कांग्रेस तथा भाजपा का एजेंट बताया, तो उनकी सरकार के अधीन काम कर रहे एक अधिकारी ने साइबेरिया का उदाहरण देकर पीड़ितों का मजाक उड़ाया। अब जब पीड़ितों को अधिक राहत प्रदान करने की जरूरत थी, तो उन्हें अस्थायी कैंपों से निकाला जा रहा है। देश के संविधान में स्वतंत्रता और समानता की बात है। अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देना सरकार का कर्तव्य बनता है। आज यह समुदाय अपनी बेबसी के साथ सभी राजनीतिक दलों की तरफ हसरत भरी निगाहों से देख रहा है, लेकिन उसके साथ दुर्व्यवहार हो रहा है।
शरदचंद्र झा, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

दाखिले का सवाल

दिल्ली में नर्सरी एडमिशन के नियम निर्धारित हो चुके हैं। हालांकि, स्कूल प्रबंधन इसलिए खुश नहीं हैं कि उनके लिए मैनेजमेंट कोटा नहीं है। कुछ अभिभावक इसलिए नाराज हैं कि उनके घर से छह किलोमीटर की अधिक दूरी पर अच्छे स्कूल हैं। देखा जाए, तो बेहतरी के लिए नियमों में थोड़ा संशोधन मुमकिन है। जैसे छह किलोमीटर की शर्त को हटा लिया जाए और कुल सीटों का निर्धारण दूरी के आधार पर हों, तो बेहतर होगा। मान लें कि कुल सौ सीटें हैं, तो सभी के चयन का निर्धारण दूरी के आधार पर हो। पहले 100 बच्चों में से 70 बच्चे सामान्य श्रेणी के हों, 20 बच्चे ईडब्ल्यूएस श्रेणी के तथा 10 बच्चे विशिष्ट श्रेणी के। मान लीजिए कि साधारण श्रेणी में तीन किलोमीटर तक के 60 बच्चे प्रवेश पा चुके हों, तो दस बच्चों के लिए तीन से चार किलोमीटर तक की लॉटरी लगाई जाए। अर्थात हर श्रेणी में दूर के बच्चों की तुलना में नजदीक के बच्चे प्रवेश के हकदार हों। अगर 100 बच्चों को प्रवेश देना हो, तो उसी तरह 100 बच्चों को वेटिंग लिस्ट में रखा जाए। यह भी ध्यान में रखने की जरूरत है कि सभी पब्लिक स्कूल तभी सुधर सकते हैं, जब इनमें एक सशक्त अभिभावक समिति हो।
एच बी शर्मा, जनकपुरी, नई दिल्ली

देना होगा जवाब

अमेरिका में भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े के साथ बदसलूकी का मामला हो या विदेशों में हमारे नेताओं-अभिनेताओं की तलाशी, इन सबके पीछे कहीं-न-कहीं हमारी कमजोर विदेश नीति जिम्मेदार है। साथ ही यह भी परिलक्षित होता है कि एक राष्ट्र के तौर पर हम सशक्त और समृद्ध नहीं हुए हैं। ऐसा नहीं है, तो क्या कारण है कि विकसित देश हमारे साथ भेदभाव  करते हैं? ताजा मामले से पहले हम बस शोर मचाकर चुप रह जाते थे। इसी बार हमने अमेरिका के प्रति सख्त कदम उठाए। यह संदेश देना आवश्यक हो गया है कि कोई भी देश हमें असमर्थ या पिछड़ा हुआ नहीं समझे। हमें अपनी विदेश नीति में सुधार लाना ही होगा और अमेरिका हो या फिर चीन या पाकिस्तान, इन सभी देशों को उसी की भाषा में जवाब देना होगा।
शशिप्रभा शर्मा, पन्नापुरी, हापुड़

कंक्रीट और पेड़

दिल्ली में ज्यादातर पेड़ों की जड़ें कंक्रीट से ढकी हुई दिखती हैं। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने दिल्ली में निगमों एवं स्थानीय निकायों को आदेश दिए हैं कि सभी पड़ों की जड़ों पर से कंक्रीट हटाई जाए और कुछ फुट की जगह कच्ची मिट्टी के लिए खाली छोड़ी जाए। पालम कॉलोनी में जब विधायक के कार्यालय में बताया गया कि कंक्रीट नहीं हटी है, तब भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। जड़ों को क्रंकीट से ढके रहने देना न केवल गैर-कानूनी है, बल्कि प्रकृति से खिलवाड़ भी है।
सरस्वती, नई दिल्ली

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