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फिल्म रिव्यू: मि. जो बी कारवाल्हो

फिल्म रिव्यू: मि. जो बी कारवाल्हो

इस फिल्म के निर्देशक ने कहा था कि वह अरशद के साथ फिल्म बनाना चाहते थे, उन्हें तीन-तीन कहानियां सुना चुके थे, लेकिन  अरशद ने अपनी सहमति नहीं दी थी। इस कहानी पर अरशद ने अपनी सहमति जताई। काश! अरशद ने इसके लिए भी मना कर दिया होता तो एक बेकार फिल्म से दर्शक बच सकते थे। पूरी की पूरी फिल्म फालतू के शोर-शराबे और ऊटपटांग हरकतों के बीच चलती है। फिल्म देखते हुए लगता है कि फिल्म के निर्देशक को ही यह नहीं पता कि वह फिल्म में दिखाना क्या चाहता है। इस फिल्म के निर्देशक समीर तिवारी एड फिल्मों के निर्देशक हैं यानी दो-तीन मिनट में पूरी बात कह देने की उनकी आदत रही है, इसलिए लगभग दो घंटे में एक पूरी कहानी कहने का धीरज वह इस फिल्म में भी नहीं दिखा पाए हैं। हल्की-फुल्की कॉमेडी के नाम पर टुकड़ों-टुकड़ों में यह पूरी फिल्म चलती है। हालांकि कॉमेडी कही जा रही इस फिल्म में फूहड़ द्विअर्थी संवाद और चलताऊ डायलाग्स तो हैं, लेकिन कॉमेडी कहीं नहीं है। न ढंग का एक्शन है, न कोई कहानी और गीत-संगीत भी बेमजा है।

वैसे तो फिल्म में कोई कहानी है ही नहीं, फिर भी कहानी के नाम पर जो है, वह यूं है। एक बेकार सा जासूस है, जिसका नाम है- जो बी कारवाल्हो (अरशद वारसी), जिसे लोग इतना मूर्ख समझते हैं कि उसे केबल कनेक्शन का पैसा वसूलने और दूध में पानी मिला है या नहीं, इसकी चोरी पकड़ने का केस देते हैं। यानी वह जासूस के नाम पर इतना बेकार है कि उससे जो भी करवा लो, वह करने को मजबूर है, इसलिए लोग उसे जो बी कारवाल्हो के बदले ‘जो भी करवा लो’  कहते हैं। कहानी में एक अंतरराष्ट्रीय डॉन है, जो एक इंटरनेशनल किलर कालरेस (जावेद जाफरी) को अपनी पूर्व प्रेमिका की शादी तोड़ने की सुपारी देता है, क्योंकि वह उसे छोड़ कर एक बिजनेसमैन के बेटे से शादी कर रही है।

दूसरी तरफ एक और बिजनेसमैन खुराना (शक्ति कपूर) जो बी को अपने प्रेमी के साथ भागी बेटी को पकड़ कर लौटाने का कॉन्ट्रैक्ट देता है। एक गलतफहमी की वजह से जो बी लड़की को पकड़ने के लिए होटल के जिस रूम में कालरेस रुका है, वहां पहुंच जाता है और कालरेस को पकड़ने निकली इंस्पेक्टर शांतिप्रिया फड़निस (सोला अली खान) जो बी को वहां देख उसे कालरेस समझ लेती है। वह उसे इंटरनेशनल किलर समझ कर दुखी हो जाती है, क्योंकि वह उसके बचपन का प्यार है। फिल्म में कॉमेडी के नाम पर जो सबसे ज्यादा आपत्तिजनक है, वह यह है कि मजाक-मजाक में बेसिर-पैर के एक हादसे में जो बी के द्वारा शांतिप्रिया के पूरे परिवार की मौत हो जाती है। फिल्म बनाते वक्त इतनी संवेदना तो होनी ही चाहिए कि मौत मजाक नहीं। उस पर से जो बी का यह बोलना कि बस इतनी सी बात पर उसकी प्रेमिका ने उसे छोड़ दिया, अखरता है। इसके अलावा सेंसर बोर्ड जो धूम्रपान और गर्मागर्म दृश्यों पर तो तुरत कैंची चला देता है, लेकिन फूहड़ता के नाम पर जानवरों के साथ हो रही फालतू की बेरहमी पर यहां चुप ही दिखता है। जो बी और शांतिप्रिया के उस दृश्य में जिसमें शांतिप्रिया के पूरे परिवार की मौत हो जाती है, में जानवरों के साथ भी आपत्तिजनक बेरहमी दिखाई गई है।

एक बात और। इस फिल्म के निर्माता-निर्देशक-लेखक तीनों की यह पहली फिल्म है। अगर आगे भी यह इसी तरह की फिल्में बनाते रहे तो बॉलीवुड की मेमोरी चिप से इन्हें डिलीट होते देर नहीं लगेगी। अरशद के लिए भी यह वेकअप कॉल है। जावेद जाफरी एक्टिंग के बदले पूरी फिल्म में गेटअप ही चेंज करते रहे हैं, वह भी प्रभावहीन है। शक्ति कपूर अब बोर करने लगे हैं। सोहा अली खान इंस्पेक्टर के रोल में अनफिट लगी। हां, अरशद की टाइमिंग हमेशा की तरह परफेक्ट रही है। हालांकि उनके करने के लिए भी कुछ नहीं था।

सितारे: अरशद वारसी, सोहा अली खान, जावेद जाफरी, शक्ति कपूर, विजय राज
निर्देशक: समीर तिवारी
निर्माता: भोला राम मालवीय, शीतल मालवीय
कहानी-पटकथा-संवाद: महेश रामचंदानी
संगीत: अमर्त्य राहुल
सिनेमेटोग्राफी: असीम बजाज
गीत: अमिताभ भट्टाचार्य, पुनीत शर्मा, विराग मिश्र, जावेद जाफरी

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