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तुम अपने दोस्त जितने अच्छे क्यों नहीं!

तुम अपने दोस्त जितने अच्छे क्यों नहीं!

दूसरे बच्चों के साथ तुलना करने के चक्कर में अक्‍सर माता-पिता अपने बच्चे को निकम्मा, नकारा व नासमझ घोषित करने में लगे रहते हैं, इस बात की परवाह किए बिना कि उनके ये ताने बच्चे के आत्मविश्वास पर क्या असर डालते हैं। तुलना करने से कैसे बचें, बता रही हैं मृदुला भारद्वाज

रीटा अपने आठ साल के बेटे मोंटू को छोटी-छोटी बातों पर डांटती रहती है। उसके नंबर कम आते हैं तो वह कहती है, ‘तुम जिंदगी में कुछ नहीं कर पाओगे। दूसरे बच्चों को देखो कितने अच्छे अंक लाते हैं। मोंटू के हाथ से कभी कोई गिलास या कप गिर जाता है तो रीटा उसे डांटते हुए कहती है, ‘तुम एक काम ठीक से नहीं कर सकते।’ इस प्रक्रिया में रीटा कभी यह सोचने की कोशिश नहीं करती कि मोंटू की मानसिकता पर इन सबका क्या असर पड़ता है। वह बस यही चाहती है कि उसका बच्चा उसकी अपेक्षाओं पर खरा उतरे और हर चीज में परफेक्ट हो। रीटा की अपेक्षाएं भी कम नहीं हैं। वह चाहती है कि उनका बेटा स्कूल में टॉपर हो और खेलों में चैम्पियन। पर क्या इस तरह के दबावों और नकारात्मक माहौल में बच्चा सचमुच बेहतर काम कर सकता है? जवाब होगा नहीं।

कहीं आपकी अपेक्षाएं तो ज्यादा नहीं!
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉं अरुणा ब्रूटा कहती हैं, ‘बच्चों के साथ इस तरह का नकारात्मक व्यवहार करने से उनकी मन:स्थिति पर बुरा असर पड़ता है। वे अपने माता पिता से नफरत करना शुरू कर देते हैं। बच्चे सोचते हैं कि हम कुछ भी कर लें लेकिन माता पिता को हमें दोष देना ही है, फिर कुछ करने का फायदा क्या है। साथ-साथ बच्चों में यह धारणा भी पुख्ता होने लगती है कि वे सचमुच जीवन में कुछ नहीं कर पायेंगे। उनका आत्मविश्वास कम हो जाता है। बच्चे खुद को हीन समझने लगते हैं। इन सबका प्रभाव बच्चे में अवसाद, गुस्सा और नर्वसनेस के रूप में दिखने लगता है, जो उनके पूरे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है।’

विशेषज्ञों के अनुसार माता-पिता बस यही चाहते हैं कि बच्चे उनकी अपेक्षाओं और सपनों को पूरा करें। अभिभावक ये भी नहीं सोचते कि उन्हें बच्चे की योग्यता के अनुसार ही उससे कुछ अपेक्षा रखनी चाहिए। बच्चे से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद रखने की बजाय उसे लगातार प्रेरित और उत्साहित करते रहना चाहिए। उसकी कोशिशों को अहमियत देनी चाहिए और उसे समझाना चाहिए कि हमें कुछ भी पाने की लगातार कोशिश करते रहना चाहिए। शुरुआती स्तर पर बच्चे के आत्मविश्वास को विकसित होने का भरपूर मौका व परिवेश देना चाहिए।

हर समय जबर्दस्ती अच्छी नहीं
माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा काबिल बने, पर इसके लिए बच्चों पर अनावश्यक बोझ डालना समझदारी नहीं है। बच्चों को सक्रिय और ऊर्जा से भरपूर बनाए रखने के लिए उन्हें विभिन्न गतिविधियों में व्यस्त रखना अच्छा तो है, लेकिन बच्चे के साथ जबर्दस्ती करना ठीक नहीं है। इससे बच्चा बोझिल होने लगता है और वह हर काम को बोझ समझने लगता है। वह किसी भी काम को मन लगाकर नहीं करता। इससे उसकी फोकस क्षमता पर भी नकारात्मक असर पड़ता है।

कहीं आपको ही तो काउंसलिंग की जरूरत नहीं!
डॉं अरुणा ब्रूटा मानती हैं, ‘यदि मां-बाप बच्चों से ज्यादा उम्मीद रखते हैं, तो ये मां-बाप का अपरिपक्व  व्यवहार है। जरूरत से अधिक अपेक्षा रखना बच्चे के सहज विकास की प्रक्रिया को रोक देता है। इससे बच्चे की अपने परिवेश को सीखने-समझने की क्षमता कम हो जाती है। ऐसी प्रक्रिया में बच्चों की काउंसलिंग की जगह  मां-बाप को अपनी काउंसलिंग और एंगर मैनेजमेंट को सीखने की जरूरत है। ऐसी किसी भी स्थिति से निबटने के लिए माता-पिता को बिना किसी संकोच के काउंसलर या मनोचिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए। इससे उन्हें एक ओर जहां पेरेंटिंग के बारे में कुछ नयी चीजें सीखने को मिलेंगी, वहीं दूसरी आपके इन प्रयासों का बच्चों पर भी सकारात्मक असर दिखाई पड़ेगा।’

खुद में बदलाव करने के लिए रहें तैयार
बच्चों की गलतियों पर आप जो प्रतिक्रिया देती हैं, उस पर संयम रखना सीखें। बच्चों की छोटी-छोटी गलतियों पर उसे डांटें नहीं, बल्कि उसे प्यार और धैर्य से समझाएं। उस परंपरागत सोच से बाहर निकलें, जहां माता-पिता जो करते हैं वह सही है। समय और समाज में आए बदलावों के साथ खुद में भी बदलाव करें।

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