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बुरे व्यवहार पर हो फुल स्टॉप!

बुरे व्यवहार पर हो फुल स्टॉप!

बच्चे बहुत प्यारे होते हैं, मासूम होते हैं और शैतान भी। पर क्या उनका व्यवहार ऐसा भी हो सकता है, जिसे हमें मिसबिहेव के दायरे में रखकर देखने की जरूरत होती है? अगर ध्यान से समझेंगी तो जवाब हां में ही होगा। अब देखिए न कभी भी और कहीं भी गुस्सा हो जाना, आपकी बात न सुनना या फिर एक बात पर अड़ना व्यावहारिक तो नहीं है। चयनिका निगम की रिपोर्ट में बच्चों की ऐसी हरकतों और उनके इलाज पर डालें एक नजर।

मेरा बेटा तो उसकी मासूम हरकतों में दूसरों को हंसता देख कर भी चिढ़चिढ़ाने लगता है, मानो उसकी ईगो को ठेस पहुंची हो’ अगर मिसेज सिन्हा की तरह आप भी ऐसा ही कहती हैं तो जरा बच्चों पर ध्यान दीजिए। बच्चे सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि कई दूसरे मिसबिहेव भी अकसर करते हैं, इन पर रोक शुरू से ही लगानी होगी।

सुनकर अनसुना करता है
पिछले एक घंटे में आप चार बार कह चुकी हैं, ‘पीहू, जरा कमरे से मेरा ऑफिस बैग लाकर दे दो।’ पर काम करना तो दूर, उसने तो आपकी बात का जवाब भी नहीं दिया। ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन वह आपकी बात और आप दोनों को ही अहमियत नहीं देगी। लखनऊ साइकेट्री सेंटर की डॉं स्मिता श्रीवास्तव कहती हैं, ‘आपको भी उनकी ही भाषा में अपनी बात कहनी होगी। मतलब वो अगर डांटने के बाद भी आपकी बात को अनसुना कर रहे हैं तो इंतजार कीजिए और अगली बार जब वो आपसे बात करने आए तो आप भी ऐसा ही व्यवहार करें। उसकी सुनें ही न। कुछ भी कहें पर आप अनसुना कर दें। तब कहीं जाकर उसको गलती का अहसास होगा।’

बोलता है बीच-बीच में
मि. गुप्ता से आज महीनों बाद ऑफिस से जुडे़ अहम मुद्दे पर बात हो रही है। पर सोनू है कि उसे अभी ही अपने दोस्त की शैतानी बतानी है। दरअसल माता-पिता बच्चों को यह नहीं बताते कि जब दो लोग आपस में बात कर रहे हों तो बीच में नहीं बोला जाता है। इसके लिए पहले तो उन्हें बैठकर समझाएं, फिर भी न समझें तो आप उससे कह सकती हैं कि अगर आगे से ऐसा किया तो मैं भी तुम्हे खेलने नहीं जाने दूंगी।’

खेल-खेल में दोस्त को मारता है
अकसर पड़ोसी आपके बेटे की शिकायत लेकर आते हैं। वजह भी छोटी-मोटी नहीं होती, बल्कि आपके बेटे ने उनके बच्चे की पिटाई की होती है। करीब-करीब हर हफ्ते ऐसा हो ही जाता है। ऐसा है तो ध्यान दें कहीं वह उग्रता की सीख तो नहीं ले रहा है। वह यह तो सोचने नहीं लगा कि अपना हक मार-पिटाई से आसानी से पाया जा सकता है। डॉं स्मिता कहती हैं कि बच्चे प्राकृतिक तौर पर आपकी कॉपी या कहें नकल करने के लिए प्रोग्राम्ड होते हैं। माता-पिता को ध्यान देना होगा कहीं घर में घरेलू हिंसा तो नहीं होती, या फिर बच्चा किसी को भी दूसरे की पिटाई करते तो नहीं देख रहा है।

बिना पूछे चीजें ले लेना
आज बॉक्स से टॉफी बिना पूछे उठा लेता है, शायद कल कोई कीमती चीज उठा ले और आपको पता ही न चले। इसके बाद बड़े होकर जब मन चाहे जहां चाहे चला जाए, या फिर बिना पूछे ही बड़े-बड़े निर्णय लेने लगे। इसके लिए आपको घर के कुछ नियम बनाने होंगे। जैसे बच्चे को पता होना चाहिए कि उसे कितने घंटे के लिए खेलने या दोस्त के यहां जाना है। यह अनुशासन आपको अपने ऊपर भी रखना होगा। मतलब माता-पिता भी अपने कहे समय पर वापस घर आएं।

बच्चे की ईगो
ईगो। यह तो बड़ों से जुड़ा एक बहुत आम सा शब्द है, पर बच्चों में यह भरपूर होने लगा है आजकल। कभी मनपसंद काम न करने देने पर तो कभी दोस्त के सामने डांट देने पर ईगो बच्चों के व्यवहार में नजर आ ही जाती है। ऐसे में माता-पिता को बच्चों को बताना होगा कि उनका यह व्यवहार एकदम भी नहीं झेला जाएगा। अगर वो ऐसा करेंगे तो उन्हें इसकी सजा मिलेगी, हो सकता है कि मम्मी-पापा बात ही न करें।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ
माता-पिता को देखकर सीखते हैं बच्चे

बच्चे की हर हरकत फिर चाहे सही हो या गलत, माता-पिता जिम्मेदार माने जाते हैं। काफी हद तक बच्चों पर माता-पिता की हरकतों का असर पड़ता भी है, जैसे माता-पिता ज्यादा लड़ते हैं तो हो सकता है बच्चा लड़ाकू प्रवृत्ति का निकले। पेरेंट्स को समझना होगा कि बच्चे आपके व्यवहार का आईना ही आपको दिखाएंगे। इसलिए ध्यान रखें, जैसे बहुत पैसा है तो बच्चे की हर मांग यों ही पूरी न कर दें। उसे अपनी चीजों का महत्व सिखाएं। यह नहीं लगना चाहिए कि उसे हर चीज यों ही मिल जाएगी और उसके लिए कोई प्रयास नहीं करने होंगे। इसके अलावा ध्यान रखें कि जिस बात के लिए माता-पिता न कह रहे हैं, उसके लिए पूरा परिवार न ही कहे। 

 (डॉं स्मिता श्रीवास्तव, साइकेट्रिक, लखनऊ साइकेट्री सेंटर)

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