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नाटक के जरिए सांप्रदायिकता पर चोट

पटना। कार्यालय संवाददाता। कभी ढोलक की ढ़ा-ढ़ा, तो कभी डफली की थाप। कभी मंजीरे की झंकार तो कभी जोगिरा की तान। सब कुछ इस अंदाज में हो रहा था कि लोग जुटते जा रहे थे। गांधी मैदान के सफदर रंगभूमि में गुरुवार दोपहर देखते-ही-देखते लोगों की अच्छी-खासी भीड़ जुट गई। प्रख्यात रंगकर्मी सफदर हाशमी की याद में आठ दिवसीय आयोजन का शानदार आगाज हुआ। नुक्कड़ नाटक से शुरुआतसफदर 2014 की शुरुआत हसन इमाम लिखित व निर्देशित खोजत भय अधेड़ नुक्कड़ नाटक से हुई।

सांप्रदायिकता व जात-पात की आड़ में युवाओं के भविष्य के साथ किस तरह खिलवाड़ किया जा रहा है। राजनेता, ब्यूरोक्रेट्स कैसे भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, इन सब चीजों को रासराज, अमरेंद्र, सत्यजीत, रवींद्र और राजू ने अपने अभिनय से जीवंत बना दिया। आदित्य मुंजर, संजय और अशोक ने गायन-वादन भी शानदार रहा। खुदा हाफिज देखकर आंखों में आंसूफिर बारी आई खुदा हाफिज नुक्कड़ नाटक की । समोश बसु लिखित और तनवीर अख्तर निर्देशित इस नुक्कड़ नाटक ने सबको भावनाओं में बहने के लिए ववशि कर दिया।

सांप्रदायिक दंगे की आग में झुलसते शहर व मानवीय रशि्तों के कत्ल को सिर्फ दो कलाकार चुनमुन व राजीव ने अपने अभिनय से लाजवाब बना दिया। कहानी यह थी कि दंगे में करीम और अवतार नामक युवक फंस गए। दोनों एक साथ छिपे। दोनों एक साथ रोए। आखिर में करीम को अपने बच्चों व बीबी की याद आने लगी। वह घर जाने के लिए चला, लेकिन पुलिस ने गोली मार दी। अवतार फफक कर रो पड़ा। रोते हुए वह भी बोला, खुदा हाफिज भाई जान।

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