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खून चूसकर ठेल देते हैं मरीज को

लखनऊ। रजनीश रस्तोगी

..बेहतर इलाज का लालच। ..दाम भी सरकारी सरीखा। प्राइवेट अस्पताल के डॉक्टर और कर्मचारी कुछ ऐसे ही झांसा देकर मरीजों को बहला-फुसला कर भर्ती करते हैं। फिर मनमर्जी से इलाज करते हैं। मोटी रकम वसूलते हैं। तब तक मरीज को डिस्चार्ज नहीं करते जब तक उसका दम न निकल जाए। जब तीमारदार मरीज को डिस्चार्ज करने का दबाव बनाते हैं तब ही उसे छोड़ते हैं।

इस दौरान घटिया इलाज से मरीज की हालत बिगड़ चुकी होती है। या तो मरीज उसी अस्पताल में दम तोड़ देता है या सरकारी अस्पताल में पहुंचने के बाद। राजधानी में प्राइवेट अस्पतालों का जाल फैला है। इनमें सुविधा के नाम पर झोलाछाप डॉक्टर और चंद मशीनें। न तो अस्पताल का सीएमओ कार्यालय में पंजीकरण और न ही प्रशिक्षित डॉक्टर। इनके चंगुल में फंसकर बेकसूर मरीज जान गंवा रहे हैं। बेबस मरीजों की तड़प और चीख-पुकार सुनने वाला कोई नहीं है।

यहां रोज संवेदनाओं और मानवता का कत्ल हो रहा है। प्राइवेट अस्पताल दूर-दराज से मरीजों को बहला-फुसलाकर मरीजों को लाते हैं। परिवारीजन जब मरीज का हाल पूछते हैं तो उन्हें मरीज की हालत गंभीर बताई जाती है। फिर मरीज को आईसीयू में भर्ती किया जाता है। आठ से 10 दिन के इलाज पर एक से डेढ़ लाख रुपए का बिल थमाया दिया जाता है।

प्राइवेट अस्पताल इलाज के नाम पर मरीजों से मोटी रकम वसूल करते हैं। हालत गंभीर होने पर मरीज को सरकारी अस्पताल में ठेल देते हैं।

प्रमुख सरकारी अस्पतालों में रोज 30 से 40 गंभीर मरीज पहुंचते हैं। प्रतिदिन 20 से 22 मरीज प्राइवेट अस्पताल से लुटने-पिटने के बाद यहां भर्ती किए जा रहे हैं। आठ से 10 मरीजों की हालत तो बेहद गंभीर होती है। इस कारण इनका इलाज कठिन हो जाता है। डॉ. टीपी सिंह, निदेशक, बलरामपुर अस्पतालआठ से 10 मरीज प्राइवेट अस्पताल से इलाज कराने के बाद भर्ती किए जा रहे हैं। सरकारी अस्पताल में इलाज कराने तक का पैसा नहीं बचता। मरीजों को यथा संभव मदद की जा रही है।

डॉ. आशुतोष दुबे, अधीक्षक, सिविल अस्पतालप्राइवेट अस्पताल में इलाज के बाद गंभीर हाल में रोजाना 10 से 12 मरीजों को यहां भर्ती किया जा रहा है। अगर सही समय पर मरीज सरकारी अस्पताल में आ जाएं तो डेथ रेट में कमी लाई जा सकती है। डॉ. आरसी अग्रवाल, सीएमएस, लोहिया अस्पताल-

प्रिया की मौत के बाद होश में आया स्वास्थ्य महकमालखनऊ। कार्यालय संवाददाताप्रिया की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग को होश आया। आनन-फानन जांच शुरू की। सीएमओ के निर्देश पर तीन सदस्यी कमेटी चौक स्थित न्यू मेट्रो हॉस्पिटल पहुंची।

उस समय अस्पताल पूरा खाली था। एक भी मरीज भर्ती नहीं था। टीम के सदस्यों ने प्रिया को ऑपरेशन की सलाह देने वाले डॉ. मनीष टंडन के बारे में पूछताछ शुरू की। हॉस्पिटल प्रबंधन ने बताया कि डॉ. टंडन लखनऊ में नहीं हैं। लिहाजा उनके बयान नहीं हो सके। बीते 24 दिसम्बर को ठाकुरगंज निवासी पान विक्रेता रमाकांत ने गॉल ब्लेडर में पथरी की परेशानी के बाद बेटी प्रिया को न्यू मेट्रो अस्पताल में भर्ती कराया था। रमाकांत ने बताया कि डॉ. अभय कृष्णा ने ऑपरेशन किया था।

इसके बाद हालत बिगड़ गई। बाद में ट्रॉमा सेंटर में उसे भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान बुधवार को प्रिया ने दम तोड़ दिया था। परिवारीजनों ने डॉक्टर की लापरवाही और हॉस्पिटल प्रबंधन की शिकायत स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन से की थी। उन्होंने सीएमओ डॉ. एसएनएस यादव को जांच के आदेश दिए थे। तीन दिन कमेटी ने कुछ नहीं किया। प्रिया की मौत के बाद सीएमओ ने डिप्टी सीएमओ डॉ. राजेन्द्र कुमार डॉ. जीएस वाजपेई समेत अन्य डिप्टी सीएमओ को जांच के लिए भेजा।

प्रिया की मौत के बाद अस्पताल में इलाज की पोल खुलने से पहले प्रबंधन ने भर्ती मरीजों को जबरन डिस्चार्ज कर दिया। मरीजों के इलाज से जुड़े दस्तावेजों को भी हटवा दिया गया है। सरकारी अस्पताल के डॉक्टर भी शामिलन्यू मेट्रो अस्पताल में सरकारी अस्पताल के एनस्थीसिया विशेषज्ञों द्वारा इलाज मुहैया कराए जाने की शिकायत मिली है। लिहाजा टीम ने इस दिशा में जांच शुरू कर दी है। सीएमओ डॉ. एसएनएस यादव के मुताबिक दूसरे जिलों के सरकारी अस्पतालों में तैनात डॉक्टरों द्वारा इलाज मुहैया कराए जाने की शिकायत प्राप्त हुई है।

सरकारी अस्पताल के एक सर्जन भी

-------------गैरकानूनी तरीके से चल रहा हॉस्पिटलन्यू मेट्रो हॉस्पिटल गैरकानूनी तरीके से चल रहा है। नियमानुसार सीएमओ कार्यालय में हॉस्पिटल का पंजीकरण होना चाहिए। उसका नवीनीकरण होना चाहिए। न्यू मेट्रो हॉस्पिटल के पंजीकरण का कई वर्षो से नवीनीकरण नहीं हुआ था। सीएमओ का कहना है कि ऐसे अस्पताल में मरीजों का इलाज नही होना चाहिए। यह गैरकानूनी है। इस दिशा में भी जांच की जा रही है।

आखिर कैसे मिले मरीज को इंसाफ

 

मरीज के गलत इलाज होने पर उसकी कहीं सुनवाई नहीं हो सकती है। उसे न्याय दिलाने के लिए कोई कानून है। जबकि जरा सा हंगामा होने पर डॉक्टर चाहे जिसे चाहे उसे जेल की हवा खिला सकता है। अब सवाल यह उठता है कि मरीज का अहित होने पर उसे कौन न्याय दिलाएगा। गलत इलाज के बाद भी उसे इंसाफ नहीं मिलता है। ं।

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