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सबको उच्च शिक्षा की राह

शिक्षा के अधिकार कानून से आम लोगों में भले ही उम्मीद जगी हो, लेकिन अब भी करोड़ों गरीब परिवारों के बच्चे अच्छी प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं। वित्तीय कठिनाइयों के कारण केंद्र सरकार शिक्षा के अधिकार को माध्यमिक और उच्च शिक्षा पर शायद ही कभी लागू करे। लेकिन आने वाले कुछ वर्षों में यह एक राष्ट्रीय मुद्दा अवश्य बनने वाला है। संभव है कि 2014 में होने वाले आम चुनाव में आर्थिक-सामाजिक विकास के मॉडल पर होने वाली राष्ट्रीय बहस में यह बात उठे कि हर भारतीय युवा को अच्छी स्कूली और उच्च शिक्षा क्यों नहीं मिलनी चाहिए? गरीबी उन्मूलन पर भारत में हुए अनेक अनुसंधानों से यह मालूम पड़ा है कि गरीबों, वंचितों व दलित वर्गों के असंख्य परिवारों के गरीबी से बाहर आने का एक मुख्य कारण यह रहा है कि उनके परिवार के सदस्य माध्यमिक या उच्च शिक्षा पाकर किसी सरकारी या प्राइवेट नौकरी में लग गए।

वंचित युवाओं का कॉलेज-यूनिवर्सिटी में प्रवेश पाना मुश्किल होता है। मगर एक बार प्रवेश मिलने के बाद उनके लिए अनंत संभावनाओं के द्वार खुल जाते हैं। 18 से 24 साल के आयु-वर्ग के युवाओं में अभी तक हमारे देश में सिर्फ 18 प्रतिशत को कॉलेज व विश्वविद्यालय में पढ़ने-लिखने के अवसर मिल पा रहे हैं। इसे सकल नामांकन दर (जीईआर) के नाम से जाना जाता  है। भारत के 18 प्रतिशत जीईआर की तुलना में थाईलैंड में यह दर 46 प्रतिशत, मलेशिया में 40 प्रतिशत, चीन में 30 प्रतिशत, दक्षिण कोरिया में100 प्रतिशत, न्यूजीलैंड में 83 प्रतिशत, ऑस्ट्रेलिया में 80 प्रतिशत और सभी विकसित देशों में औसतन 50 प्रतिशत है। यूनेस्को के अनुसार, विश्व में औसतन जीईआर करीब 30 प्रतिशत है।

भारत में जहां सबको नि:शुल्क व अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा लागू करने में तमाम मुश्किलें आ रही हैं, वहां सबको अच्छी उच्च शिक्षा मुहैया कराना एक खयाली पुलाव जैसा दिखता है। अभी करीब दो करोड़ भारतीय युवा ही उच्च शिक्षा के अवसर हासिल कर पा रहे हैं। 2020 तक ये अवसर हमें चार करोड़ युवाओं को और 2030 तक 10 करोड़ को उपलब्ध कराने होंगे, नहीं तो दुनिया का सर्वाधिक युवा राष्ट्र बनने का गौरव बदहाली में बदल सकता है। वर्ष 2030 तक सबको उच्च शिक्षा उपलब्ध कराना लगभग असंभव लक्ष्य लगेगा, क्योंकि हजारों नए विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को स्थापित करने के लिए लाखों करोड़ रुपये की जरूरत होगी। लेकिन इधर कुछ वर्षों में सूचना प्रौद्योगिकी और मोबाइल प्रौद्योगिकी के माध्यम से उच्च शिक्षा के ऐसे अनेक इनोवेटिव मॉडल उभरकर आए हैं, जो विश्व स्तर पर उच्च शिक्षा में एक नई क्रांति की दस्तक माने जा रहे हैं।

विश्व स्तर पर उच्च शिक्षा में जो क्रांतिकारी प्रयोग सफल हो रहे हैं, उनमें आजकल ‘ओपन एडूकेशनल रिसोर्सेज (ओईआर) की बहुत चर्चा है। इसके तहत शिक्षण, शोध और पढ़ाई की सारी सामग्री जैसे पाठ्यक्रम, मॉड्यूल, शोध लेख, वीडियो, प्रश्न पत्र, सॉफ्टवेयर आदि को ओपन डोमेन में रख दिया जाता है, जिसका विश्व स्तर पर कोई भी व्यक्ति नि:शुल्क उपयोग कर सकता है। इसकी लोकप्रियता ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर मूवमेंट की तरह बढ़ रही है। ओईआर की लोकप्रियता का मुख्य कारण अध्ययन-अध्यापन में उच्च क्वालिटी की उच्च शिक्षा की बढ़ती मांग है, जिसके लिए ऊंची फीस चुकाना सबके बस की बात नहीं।

एक तरह से यह बाजारवादी उच्च शिक्षा के विरुद्ध उन शिक्षाविदें की मुहिम है, जो ज्ञान के व्यापार  के विरोधी हैं। ओईआर की शुरुआत अमेरिका की विख्यात प्रौद्योगिकी यूनिवर्सिटी- एमआईटी ने 2002 में की थी, जिसको ‘एमआईटी-ओसीडब्ल्यू’ (एमआईटी-ओपन कोर्स वेयर) नाम दिया गया। इसमें एमआईटी के बहुमूल्य 1,200 कोर्स मैटेरियल नि:शुल्क उपलब्ध हैं। इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी के विद्यार्थी इनका उपयोग पढ़ाई के लिए करते हैं। अब तक ओसीडब्ल्यू को 10 करोड़ बार देखा जा चुका है, इसमें से 60 प्रतिशत से ज्यादा प्रयास यूरोप और एशिया के देशों से किए गए हैं।

पिछले एक दशक में ओईआर आंदोलन विश्वव्यापी स्तर पर फैल गया है। यूनेस्को और कॉमनवेल्थ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अलावा जापान, चीन और भारत की शिक्षण संस्थाएं इसमें बहुत रुचि ले रही हैं। भारत में ओईआर के कई दिलचस्प उदाहरण हैं। मिसाल के तौर पर, आईआईटी (दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कानपुर और खड़गपुर) और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु ने मिलकर एनपीटीईएल बनाया है, जिस पर प्रोफेसरों के वीडियो व्याख्यान हजारों इंजीनियरिंग कॉलेजों के छात्रों व शिक्षकों के लिए नि:शुल्क उपलब्ध हैं। इग्नू, इक्रीसेट, आईआईटी, मुंबई और आईआईटी, केरल द्वारा भी इस दिशा में उल्लेखनीय प्रयास किए गए हैं।

ऐसी ही एक और व्यवस्था है मूक्स (मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्सेज)। यह ओईआर का ही आधुनिक रूप है, जिसे ‘एड एक्स’ नाम से एमआईटी, हॉर्वर्ड, कैलिफोर्निया, बर्कले, टेक्सास और जॉर्जटाउन जैसे अमेरिका के विख्यात विश्वविद्यालयों ने प्रारंभ किया है। ‘एड-एक्स’ पर  फिलहाल 1,55,000 विद्यार्थी रजिस्टर्ड हैं, जो इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस, विज्ञान, समाज विज्ञान, मानविकी और विधि शास्त्र से संबंधित कोर्सों की नि:शुल्क पढ़ाई कर रहे हैं। अगर उन्हें संबंधित कोर्स में टेस्ट पास करके प्रमाण-पत्र लेना होता है, तो फीस देनी पड़ती है। ‘एड-एक्स’ अभी तक ‘नॉन-प्रॉफिट’ संस्था के तौर पर चलाई जा रही है, किंतु मूक्स के मॉडल को कई कंपनियां मुनाफे के लिए भी अपना रही हैं। ‘कोरसेरा’ और ‘ऊडेसिटी’ नाम की दो कंपनियां बहुचर्चित हैं, जिन पर करीब 33.5 लाख विद्यार्थी विभिन्न विषयों की नि:शुल्क पढ़ाई कर रहे हैं।

‘मूक्स’ के विचार का सर्वाधिक और बहुचर्चित उपयोग अमेरिका में बांग्लादेश से आकर बसे हुए एक गणित शिक्षक सलमान खान ने किया, जिनकी साइट ‘खान एकेडमी’ पर विज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र, मानविकी तथा कंप्यूटर सांइस के 3,900 स्कूली लेक्चर उपलब्ध हैं। ‘खान एकेडमी’ द्वारा गणित पर बनाए गए ‘वीडियो ट्यूटोरियल’ संपूर्ण विश्व में खासे चर्चित हुए, जिनको बिल व मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन से वित्तीय सहायता भी मिली है। खान एकेडमी के असंख्य प्रशंसकों में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी हैं, जो अमेरिकी अभिभावकों की अपने बच्चों को गणित सिखाने की चिंताओं को लेकर बहुत परेशान रहते हैं। भारत में बहुत से शिक्षाविद् और नीति-निर्माता आर्थिक संसाधनों की कमी का बहाना बनाकर ओपन रिसोर्सेज और मूक्स की उपादेयता पर प्रश्न चिन्ह लगा सकते हैं।

यह कहा जा सकता है कि हमारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पहले फैकल्टी, लाइब्रेरी, लेबोरेटरी, होस्टल, इंटरनेट आदि की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए, तभी सूचना-प्रौद्योगिकी तथा मूक्स जैसे क्रांतिकारी माध्यमों को अपनाया जा सकता है। यह बात अपनी जगह ठीक है कि पहले बुनियादी सुविधाएं सबको दी जानी चाहिए, लेकिन विज्ञान और प्रौद्योगिकी जिस तरह से समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था और शिक्षा में क्रांतिकारी परिवर्तन ला रही है, हमें भारतीय उच्च शिक्षा में इन परिवर्तनों को जल्दी से जल्दी समाहित करने में जरा-सी भी कोताही नहीं बरतनी चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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