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कब उजागर होंगे ललित बाबू की हत्या के राज

अपने दौर के लोकप्रिय नेता व तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या को आज 39 साल हो गए हैं। आज भी उस हत्या का मसला ग्यारह हजार से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट, 22 से ज्यादा जजों की सुनवाई, सीबीआई के 158 से ज्यादा और बचाव पक्ष के 39 से ज्यादा गवाहों के बीच उलझा और अनसुलझा पड़ा है। इस मामले को नौ जनवरी 1975 को सीबीआई को सौंपा गया था और आनन-फानन में एक नवंबर 1975 को ‘चाजर्शीट’ दाखिल की गई थी। लेकिन बहुत सारे सवाल जो उस समय अनुत्तरित थे, आज भी उनका जवाब नहीं मिला है। आश्चर्य है कि समस्तीपुर में दो जनवरी 1975 की शाम बम विस्फोट में घायल रेल मंत्री और कद्दावर कांग्रेसी नेता को क्यों रात भर रेल के डिब्बे में कराहते छोड़ा गया? क्यों उन्हें समस्तीपुर से लगभग 150 किलोमीटर दूर दानापुर के फौजी अस्पताल में दाखिल कराया गया? क्या सिर्फ 30 मिनट दूर दरभंगा में उन्हें दाखिल नहीं कराया जा सकता था? आखिर क्यों उस रेल को जिसमें घायल रेल मंत्री सफर कर रहे थे, पटना में नहीं रोका गया? क्यों ट्रेन दानापुर रेलवे स्टेशन पहुंचने के बाद भी शटिंग व सही प्लेटफॉर्म पर रोकने के बहाने 45 मिनट से ज्यादा का समय बर्बाद किया गया? मृत्यु की वजह साफ करते हुए सर्जन डॉक्टर वीपी वर्मा ने कहा भी था कि इलाज में हुई अनावश्यक देरी मौत की वजह है। इस सबके पीछे कौन था। कई ऐसे अनसुलझे प्रश्न मन को झकझोरते हैं।

सात जनवरी 1975 को ललित बाबू की स्मृति में दिल्ली में आयोजित एक सभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा कि ललित बाबू की हत्या तो एक अभ्यास ही है, असली ‘टारगेट’ तो मैं हूं। इसके पहले खुद ललित नारायण मिश्र को भी यह लगने लगा था कि उनकी हत्या हो सकती है। इतने बड़े नेताओं के मन में ये आशंकाएं क्यों मंडरा रहीं थीं? ललित बाबू के निधन के ठीक बाद के छह महीनों में भारतीय राजनीति ने कई करवटें ली। एकजुट विरोधी दल की छिटपुट चुनावों में लगातार हो रही जीत और जयप्रकाश नारायण की विशाल होती लोकप्रियता,  इस तरह का कांग्रेस विरोधी माहौल दरअसल 1967 के कांग्रेस विरोधी माहौल से काफी बदला हुआ और मुखर था। फिर इमरजेंसी और भारतीय लोकतंत्र के काले डेढ़ साल ने कांग्रेस की कमर ही तोड़ दी। चुनाव में सारे कांग्रेसी दिग्गजों की हार हुई और जनता पार्टी सरकार का गठन हुआ। आज ललित बाबू की हत्या के 39 सालों बाद जब पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि यह जो हुआ उसमें सिर्फ राजनीति ही नहीं थी।

उसके साथ ही साथ एक बड़ी तिकड़मबाजी भी चल रही थी। दिक्कत यह है कि हमारे यहां राजनैतिक हत्याओं के जांच होती है वह तत्काल कारणों और षड़यंत्र से आगे नहीं बढ़ पाती। अक्सर हम जान ही नहीं पाते कि इसके पीछे का बड़ा राजनैतिक षड़यंत्र क्या था। यही इस मामले में भी हुआ।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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