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खंबा नोचती बिल्लियों के नाखून

जनता को मूर्ख मानने के पीछे नेताओं का एक विश्वास ये भी होता है कि जो लोग हमें चुन सकते हैं, उनमें भला कितनी अक्ल होगी। तभी तो सीडब्ल्यूजी से लेकर टू-जी और जीजा जी तक न जाने कितने घोटाले करने वाली पार्टी का युवा मोर्चा जब जंतर—मंतर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोध—प्रदर्शन करता है, तो मैं ये सोचकर सहम जाता हूं कि आज तक कितने नाराज़ लोगों ने जंतर—मंतर पर आत्मदाह किया है। कहीं ये सब देख, खुद जंतर—मंतर आत्मदाह न कर ले। उधर जब दिल्ली की गलियों में बीजेपी कार्यकर्ता वीरभद्र सिंह के कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ चिल्लाकर अपनी आवाज़ मंगलयान तक पहुंचा रहे होते हैं, ठीक उसी वक्त बंगलुरु की किसी लोकल परचून की दुकान पर बीजेपी कार्यकर्ता येदुरप्पा के राजतिलक के लिए कुमकुम खरीद रहे होते हैं। वही येदुरप्पा, जिनकी लुंगी पर लगी लाल रंग की लेस पसंद न आने पर पार्टी आलाकमान ने उन्हें निकाल दिया था।

आज तक इन मासूम बदमाशियों के पीछे दिग्गज पार्टियों का यह परम विश्वास था कि हमने आम आदमी की जिंदगी में इतने सवाल छोड़ रखे हैं, वो हमसे भला क्या जवाब मांगेगा? आम आदमी गिड़गिड़ा सकता है, चिल्ला नहीं सकता। मगर अब वो चिल्लाया है तो ये शिकायत कर रहे हैं कि तुम लाउड बहुत हो। काम से बीमारी तक हर चीज़ का दिखावा करते हो। बीमार होने पर ट्विटर पर बताते हो कि मुझे दस्त लगे हैं। हमें भी आठ दिसंबर से लगे हैं, किसी को बताया क्या? तुम आम आदमी की बात करते हो लेकिन उसे नहीं समझते। समझते, तो इस ठंड में मुफ्त पानी बांटकर उस पर नहाने के लिए दबाव नहीं डालते। वैसे मुफ्त चीजें लेने से जनता की आदतें ख़राब होती हैं, तो क्या हुआ जो छत्तीसगढ़ में तीन रुपये किलो चावल से नहीं हुई। तुम बिजली पर सब्सिडी देकर जनता के पैसे की बर्बादी कर रहे हो, तो क्या हुआ जो ऐसी ही बर्बादी अर्जुन सिंह ने मध्यप्रदेश में की थी। संभल जाओ, सब कुछ अच्छा कर देश के राजनीतिक माहौल को खराब मत करो। वैसे भी जनता को मुफ्त बिजली नहीं, मुफ्त बिजली के झटकों की ज़रूरत है, जो हमने 220 रुपये सिलेंडर के दाम बढ़ाकर दे दिए हैं।

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