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सियासत का ककहरा

सिंगापुर के प्रधानमंत्री लीकुआन अपनी जीवनी थर्ड वर्ल्ड टू फस्र्ट’ में लिखते हैं कि सिंगापुर को करिश्माई मुल्क बनाने के लिए मैंने अपने देश के बुद्धिजीवियों, इंजीनियरों, डॉक्टरों को राजनीति में आने के लिए फुसलाया, प्रेरित किया। सबसे अच्छे दिमाग आखिर राजनीति से दूर क्यों रहें! शुरू में इन्हें लाने में मेहनत करनी पड़ी, क्योंकि इनके मिजाज में लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को सुनने-समझने का धैर्य नहीं था। लेकिन धीरे-धीरे देश-विदेश में पढ़ी इन प्रतिभाओं के जुड़ने से सिंगापुर की राजनीति भी बदल गई और शासन भी। आज हम दुनिया के सर्वश्रेष्ठ देशों में शामिल हैं। लेकिन हमारे देश के लोकतंत्र में इनकी भागीदारी न नेता चाहते हैं, न दल और न बुद्धिजीवी। नेता क्यों अपने वंश की जड़ों में मट्ठा डालें? बुद्धिजीवी चालाक हैं।

उन्हें आजादी जो रहती है, मनमर्जी सत्ता की तरफ जुड़ने या उसे छोड़ने की। इसीलिए राजनेताओं ने इन्हें गिनना ही बंद कर दिया है। इन दिनों नए लोगों के नाम-पते से मेरी डायरी भरती जा रही है। इतने लोगों से मिलना हो रहा है कि दिमाग का आयतन छोटा पड़ जाए या फूट जाए। अपने पड़ोसियों को पहली बार जान रहा हूं। जिस दो कुत्ते वाले पड़ोसी से मैं अब तक नहीं बोलता था, उस दिन उसके कुत्ते को मैंने पुचकारा और रोककर उसका हाल-चाल पूछा। जिस सज्जन के दिल का इलाज हुए तीन महीने हो चुके हैं, उनका दर्द जानने की फुरसत मुझे अब मिली थी। वाकई राजनीति सिर्फ तोड़ती ही नहीं, जोड़ती भी है। भले ही मतलब की खातिर!
लेखक मंच में प्रेमपाल शर्मा

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