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दिल्ली में विश्वास मत

आम आदमी पार्टी के गठन से लेकर अब तक के उसके संक्षिप्त सफर में परंपरागत राजनीति की कई परिपाटियां टूटी हैं, इसी तरह दिल्ली विधानसभा में उसके विश्वास मत में भी काफी कुछ अलग है। ‘आप’ ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई है, लेकिन दोनों पार्टियों के बीच संबंध कतई मधुर नहीं हैं। ऐसा पहले भी होता आया है कि घोर विरोधी पार्टियों ने एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने के बावजूद मिलकर सरकार बनाई। लेकिन इस गठबंधन में खास बात यह है कि साथ आने के बावजूद दोनों पार्टियों ने अपना परस्पर विरोध न खत्म किया है, न ही इसे छिपाया है। ‘आप’ की सरकार ने विश्वास मत पाने के पहले जो एक-दो बड़े फैसले किए हैं, उनमें दिल्ली में बिजली सप्लाई करने वाली निजी कंपनियों का सीएजी से ऑडिट करवाना सबसे महत्वपूर्ण है। मुमकिन है कि इस ऑडिट में पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार पर कुछ आरोप सामने आ जाएं, बल्कि मुख्यमंत्री केजरीवाल का कहना यह है कि हाईकोर्ट के कथित आदेश की आड़ में शीला दीक्षित की सरकार ऑडिट से बच रही थी। इसके बावजूद कांग्रेस ने ‘आप’ की सरकार को समर्थन दिया है।

इस बात पर दोनों पार्टियों के विरोधी टिप्पणी भी कर रहे हैं, लेकिन राजनीति का यह एक नया और दिलचस्प प्रयोग फिलहाल तो जारी रहेगा। गठबंधन के सारे ही प्रयोग राजनीतिक सुविधा के लिए होते हैं, लेकिन उन पर कुछ सैद्धांतिक मुलम्मा चढ़ा दिया जाता है। इस प्रयोग में ऐसा कोई मुलम्मा नहीं है। दिल्ली में तुरंत फिर से चुनाव न हों और दिल्ली वासियों को सरकार मिल सके, घोषित रूप से इन उद्देश्यों के लिए सरकार का गठन कोई ऐसी बात नहीं है, जिसकी निंदा होनी चाहिए। कांग्रेस के राजनीतिक हित इसी में हैं कि दिल्ली में चुनाव अगले लोकसभा चुनाव तक या उनके साथ न हों। ‘आप’ को समर्थन देकर वह दिल्ली में भाजपा को सरकार बनाने से भी रोक सकती है। इसलिए यह एक अनोखी स्थिति पैदा हुई कि समर्थन देने वाली पार्टी ने अपनी ओर से बढ़-चढ़कर पेशकश की और सरकार बनाने वाली पार्टी ने हिचकिचाहट दिखाई।

जहां कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा की, वहीं ‘आप’ ने समर्थन लेने के लिए शर्तें रखीं। आमतौर पर इसका उल्टा देखने में आता है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कई नए प्रयोग होते रहते हैं, उनमें से कुछ सत्ता के फायदे पाने के संकीर्ण उद्देश्य से होते हैं, इसलिए व्यापक समाज के लिए फायदेमंद नहीं होते, लेकिन कई प्रयोगों से नई राहें खुलती हैं और लोकतंत्र उनसे समृद्ध होता है। जाहिर है, लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और ‘आप’ एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होंगे और यह बहुत मुमकिन नहीं लगता कि मौजूदा चुनावी माहौल में यह गठबंधन खड़ा हो पाएगा, लेकिन ‘आप’ के रणनीतिक और प्रशासनिक कौशल की इस बीच कड़ी जांच भी हो जाएगी। जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है, तो उसे तरह-तरह के झटके बर्दाश्त करने का लंबा अनुभव है और नतीजों के लिए वह तैयार होगी।
इस समूची प्रक्रिया का अगर वास्तविक और स्थायी हासिल कुछ होगा, तो वह सिर्फ बिजली और पानी के दामों से संबंधित नहीं है।

इस प्रक्रिया में ‘आप’ को लोकतांत्रिक राजनीति के लिए जरूरी लचीलापन सीखने को मिलेगा। जरूरी नहीं कि लचीलापन समझौतापरस्ती और भ्रष्टाचार से जुड़ा हो, लचीलापन दूसरों को साथ लेकर चलने का कौशल भी होता है। इसी प्रक्रिया में परंपरागत राजनीतिक पार्टियां यह समझेंगी कि सिद्धांतवादिता और ईमानदारी हर वक्त घाटे का सौदा नहीं होता। यह एक प्रयोग है, और यह उम्मीद की जा सकती है कि इसके नतीजे जनता के हित में होंगे।

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