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साल दर साल

2013 में दूसरी बार संविधान सभा के चुनाव हुए। इस बार पिछली असेंबली के विजेताओं को जनता ने सबक सिखाया। पुरानी पार्टियों पर फिर से भरोसा जताया गया और उन्हें संविधान लिखने का अधिकार मिला। अधिकतर लोगों को चुनाव के ऐन पहले तक विश्वास नहीं था कि लोकतांत्रिक प्रणाली पटरी पर लौट पाएगी। पर अब कयासों के कोहरे छंट गए। हांलाकि अब भी कई बेजुबानों को आवाज मिलना बाकी है। 17 दिसंबर को 40 साल की एक विकलांग औरत के साथ बलात्कार हुआ, लेकिन मामले को सुलह-समझौते से निपटा दिया गया। जून 2013 में 30 साल की एक महिला पर उसके पति ने ही तेजाब फेंका। इस मामले की शिकायत नजदीकी थाने में दर्ज हुई, किंतु बाद में मध्यस्थता के जरिये उसे भी निपटा दिया गया।

पिछले वर्ष नेपाली टाइम्स  में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिसमें बताया गया था कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के मामले में अपराधियों को बचाने के लिए में कुछ संस्थाएं पैसे मांगती हैं। देश का अंतरिम संविधान कहता है कि जनता को खुशहाल रखने की जिम्मेदारी शासन की है। जनता की सुरक्षा कई संस्थाएं सुनिश्चित करती हैं, जिनमें प्रमुख है कानून बहाल करने वाली संस्था। इसी संविधान में उल्लेख है, ‘किसी भी महिला को शारीरिक, मानसिक या अन्य तरह की हिंसा के लिए विवश नहीं किया जा सकता।’  हमारी संस्थाएं दोषियों को बचाती हैं, न कि दंडित करती हैं।

यौन-हिंसा के मामले में पीड़िता को इंसाफ दिलाना नेपाल में कठिन काम हो गया है। अपने नागरिकों की रक्षा के लिए शासन संविधान से बंधा होता है। भारत की राजधानी दिल्ली में एक दुष्कर्म की घटना के बाद जब एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और उसे मरने के लिए फेंक दिया गया था, तब लोगों का गुस्सा आसमान पर चला गया था और उन्होंने मौजूदा कानून और हालत के खिलाफ अपनी नाराजगी जताई। नतीजतन, भारत सरकार ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश जे एस वर्मा की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया। वर्मा आयोग की अनुशंसाओं को भारतीय संविधान में शामिल किया गया। क्या काठमांडू में ऐसे बदलाव मुमकिन हैं? 
द काठमांडू पोस्ट, नेपाल

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