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ये सनक ओसीडीतो नहीं!

कहते हैं, सफल होने के लिए एक जुनून जरूरी है। कुछ टीवी चैनलों ने ‘पागलपन जरूरी है’ का स्लॉट भी खूब हिट किया। लेकिन यही जुनून अगर पागलपन और सनक की हद पार करने लगे तो खुद को संभालना जरूरी हो जाता है। यह मानसिक रोग भी हो सकता है। भारत में ओसीडी यानी ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर जैसी व्याधि भी युवाओं को सताने लगी है। इसके लक्षण और बचने के उपायों पर मनीष शुक्ला की रिपोर्ट।

नवीन सान्याल ने हाल ही में बीएड की पढ़ाई पूरी की है। अभी कुछ दिन पहले वह एक कॉन्वेंट स्कूल में इंटरव्यू देने गए। वहां उनके अलावा 15 और अभ्यर्थी इंटरव्यू के लिए सोफे पर बैठे थे। नवीन भी वहीं जाकर बैठ गए। अचानक नवीन की नजर फर्श के डिजाइन पर गई। उसमें सीमेंट की एक काली लाइन खिंची थी। नवीन के दिमाग में अचानक यह बात आई कि अगर वह जाकर यह लाइन पार कर लें तो उनका चयन हो जाएगा। इस ख्याल के आते ही वह खड़े हुए और चुपचाप जाकर लाइन पार कर ली। कोई अन्य कुछ भी समझ नहीं पाया। लेकिन कुछ ही मिनट में उनके दिमाग में न जाने कहां से वही ख्याल फिर आ गया और नवीन ने दोबारा जाकर वह लाइन पार की। फिर तो वह बार-बार यह प्रक्रिया दोहराने लगे। अब तक वहां इंटरव्यू की कतार में बैठे हरेक के मन में उनकी मानसिक स्थिति साफ हो चुकी थी। अंत में यह बात स्कूल डायरेक्टर तक पहुंच गई और  उनका चयन नहीं हुआ।

सिर्फ नवीन ही नहीं, हमारे आसपास और भी कई ऐसे लोग होते हैं, जो छोटी-छोटी बातों-आदतों को सनक के स्तर तक ले जाते हैं और बाद में यही सनक रोग में बदल जाती है। इस मानसिक व्याधि को मनोचिकित्सा की भाषा में ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर कहते हैं। हिन्दी में इसे जुनूनी बाध्यकारी विकार भी कहा जाता है। इस विकार से ग्रस्त व्यक्ति में अजीब सा भय सताने लगता है। इससे बचने के लिए वह कुछ न कुछ ऐसा कार्य करता है, जिसमें अजीब तरह की सनक होती है। मसलन कोई क्रिकेट का जुनूनी प्रशंसक होता है, किसी को सनक की हद तक जूतों का शौक होता है तो कोई बिना कारण ही झूठ पर झूठ बोलता रहता है। सबसे डराने वाली बात यह है कि लोग इसके पीछे कारण नहीं तलाश पाते, क्योंकि यह कोई बीमारी का लक्षण तो है नहीं कि आसानी से दिख जाए। इसमें आप चाह कर भी अपने दिमाग में आने वाले विचारों पर लगाम नहीं लगा पाते।

अगर आप एक ही चीज को बार-बार छूते हैं, दिन में बार-बार हाथ धोने जाते हैं, बार-बार बाल ठीक करते रहते हैं, पैसे या अन्य चीजें रह-रह कर देखते और गिनते हैं, अपना चेहरा शीशे में देखते रहते हैं और अपने आसपास को लेकर हर समय शंकित रहते हैं तो यह ओसीडी की शुरुआत हो सकती है। सही समय पर पहचान करके आप बड़ी समस्या से बच सकते हैं।

डार्विन को भी था ओसीडी!
आंकड़ों की मानें तो लगभग 50 में से एक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में ओसीडी हो सकता है। पुरुषों और महिलाओं में इसका अनुपात समान है। यूके में लगभग 10 लाख लोगों को ओसीडी है। जीव वैज्ञानिक चाल्र्स डार्विन, फ्लोरेंस नाइटिंगेल, पिल्ग्रिम प्रोग्रेस के लेखक जॉन बनियन आदि ओसीडी ग्रसित हस्तियों में से हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि अगर आपका बार-बार दोहराने वाला व्यवहार आनंददायी है तो वह ओसीडी नहीं है। जैसे, अगर आप जुआ खेलते हैं, शराब पीते हैं या ड्रग्स वगैरह लेते हैं तो यह ओसीडी नहीं है। पर ज्यादा व्यायाम करना, जिसमें आनंद की अनुभूति की बजाय शरीर को कष्ट हो तो यह खतरनाक है।

लक्षण पहचानें, इलाज कराएं
बीएलके सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के मनोचिकित्सक डॉ. मनीष जैन के मुताबिक एपीडेमियोलॉजिकल (महामारी विज्ञान के आधार पर) स्टडी बताती है कि भारत में ओसीडी ग्रसित लोगों का अनुपात पूरे विश्व का 0.6 है। हालांकि इस आधार पर यूरोपियन और नॉर्थ अमेरिकन अध्ययनों में यह दो से तीन फीसदी है। डॉ. जैन का कहना है कि भारत में ओसीडी मरीजों की गणना ठीक नहीं लगती, क्योंकि हम लगभग हर दिन ऐसे मरीजों को देखते हैं। हां, हमारे देश में जागरूकता की कमी होने के कारण लोग अपने मर्ज को पहचान नहीं पाते। कई बार वे पहचान कर भी इलाज के लिए तैयार नहीं होते। लोगों को यह पता चलना चाहिए कि ओसीडी का इलाज बहुत आसान है। कई बार यह सनक  शरीर को नुकसान पहुंचाती है। जैसे बार-बार साबुन से हाथ धोते हैं तो ज्यादा कास्टिक से हाथों में छाले भी पड़ सकते हैं।

पीड़ित हैं तो क्या करें?
- परेशान करने वाले विचारों से भागे नहीं। अपनी आदत या व्यवहार से दूर भागने के लिए खुद को फिजूल के कामों में न उलझाएं।
- विचारों को रिकॉर्ड करिये, उन्हें सुनिये, लिखिए और फिर से उन्हें पढ़िए, ऐसा प्रतिदिन लगातार आधे घंटे तक करिए, जब तक घबराहट कम न हो।
- घबराहट कम करने के लिए नशे का प्रयोग कतई न करें।

कैसे पहचानें कि इलाज की जरूरत है
- आपको आत्महत्या या किसी को चोट पहुंचाने का विचार बार-बार आता है।
- अगर आपको बार-बार खाने की इच्छा या गंभीर तनाव, गुस्सा, चिड़चिड़ापन लगातार सता रहा है।
- आपके विचारों ने आपके दिलो-दिमाग पर कब्जा कर लिया है और आप परेशानी में उलझ गए हैं।

परिवार का सहयोग
- ओसीडी वाले लोगों का व्यवहार बहुत निराशाजनक हो सकता है, पर याद रखें कि वे बुरा या अजीब-सा व्यवहार करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, बल्कि ऐसा खुद-ब-खुद हो रहा है।
- ओसीडी पीड़ित व्यक्ति को इस संबंध में अधिक से अधिक पढ़ने व बात करने के लिए प्रोत्साहित करें।
- उन्हें भयभीत परिस्थितियों का सामना करने के लिए प्रोत्साहित करें। याद रखें मानसिक समस्याओं में परिवारजनों का सहयोग खासी अहमियत रखता है।
- पेशेवर साइकेट्रिस्ट से पूछें कि ओसीडी के शिकार लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। बिना जानकारी के आप किसी व्यक्ति के सिर्फ लक्षण व आदतों को देख कर ही उन्हें ओसीडी का शिकार न मान लें।

ऑब्सेशन (सनकीपन) क्या है ?
ऑब्सेशन ऐसे विचार होते हैं, जो किसी व्यक्ति में उसके रोकने की इच्छा किए जाने पर भी बार-बार उठते हैं। इससे ग्रसित लोग किसी विशिष्ट कार्य को बार-बार करने पर बाध्य रहते हैं। हल्के ऑब्सेशन वाले मामलों में सामान्यत: तनाव आदि रहता है और जीवन में हंसी-खुशी के प्रति शंकाप्रद स्थिति भी रहती है, लेकिन ऑब्सेशन के गंभीर मामलों में अपने किसी निकटवर्ती की मृत्यु का डर या ‘रिलेशनशिप राइटनेस’ का असर देखा जाता है, जिसमें किन्हीं खास रिश्तों के बारे में जुनून की हद तक ऑब्सेशन देखा जाता है, जिनका असर अंतत: उन रिश्तों पर भी पड़ सकता है।

ऑब्सेशन की जद में सैक्स से जुड़े मामले भी आते हैं। इसमें अपने जानकारों या अनजान व्यक्तियों के प्रति प्राकृतिक या अप्राकृतिक यौनाचार से जुड़े विचार भी ओसीडी ग्रसित व्यक्ति के दिमाग में उठते हैं। ऑब्सेशन के शिकार लोग हमेशा तनावग्रस्त दिखते हैं।

कम्पल्शन या बाध्यता
आब्सेशन के शिकार लोग अपनी आदत को सुधारने के लिए तमाम विचार अपने मन में लाते हैं, जैसे कोई मंत्र जाप करना आदि। ये लोग कर्मकांड की तरफ भी मुड़ जाते हैं। काम को  धीरे-धीरे करते हैं। चीजों को व्यवस्थित करेंगे, फिर काम पूरा करेंगे। वे बार-बार चीजों की जांच करते हैं, जैसे ताला लगाया या नहीं। परहेज भी इनकी जीवनचर्या का हिस्सा बन जाता है। ये लोग विशेष प्रकार के भय में जीने लगते हैं।

जीवन भी पर पड़ता है असर
ओसीडी से ग्रसित लोग अगर गंभीर रूप से ग्रसित हैं तो उन्हें पारिवारिक जीवन में कठिनाइयां आती हैं। जब आप सभी लोगों को अपनी आदतों में बार-बार शामिल करते हैं तो लोगों को परेशानी होती है।

यूं तो ओसीडी आनुवांशिक भी हो सकता है, लेकिन एक तिहाई लोगों में यह तनाव की वजह से होता है। कई बार आपके ऊपर अचानक कोई बड़ी जिम्मेदारी आने जैसे नई नौकरी या शादी या बच्चे को जन्म देने के बाद यह समस्या आ सकती है। इस दौरान हमें पता नहीं चलता और हमें ओसीडी हो जाता है। अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि सोरोटोनिन (5 एचटी) का असंतुलन ओसीडी की वजह है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि अगर आप बहुत साफ-सुथरे, अत्यधिक ध्यान से या व्यवस्थित तरीके से जीने वाले व्यक्ति हैं और आपके ऊंचे नैतिक सिद्धांत हैं तो आपको ओसीडी की संभावनाएं ज्यादा हैं।

बदल जाती है सोच
ओसीडी से ग्रसित व्यक्ति की सोच एकदम बदल जाती है। उसके मन में कभी न कभी अजीबोगरीब विचार या दृश्य आते हैं। कभी वह एक्सीडेंट को लेकर डरता है तो कभी खुद को नुकसान पहुंचाने के बारे में सोच कर डर जाता है। वैसे सबके मन में ऐसे ख्याल आते हैं, मगर हम इन्हें तुरंत झटक देते हैं। ओसीडी ग्रसित व्यक्ति इन्हें रोक नहीं पाता, बल्कि उनसे बचने के तरीके अपनाता है।

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