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नया साल नए अजूबे

नया साल नए अजूबे

तुम दुनिया के नए-पुराने सभी अजूबों के बारे में जानते होगे। ये अजूबे वर्षों पहले बने थे, मगर आज भी ऐसे कई काम हो रहे हैं, जो तुम्हारे लिए किसी अजूबे से कम नहीं हैं। आज इनके बारे में तुम्हें बता रहे हैं पंकज घिल्डियाल

दुनिया का पहला निराला घर
आज तक तुमने कई तरह के डिजाइन वाले घर देखे होंगे। कई ऐसे घर होंगे, जो कि सी अनोखे आकार में तुम्हें आकर्षित भी करते होंगे। अलग-अलग तरह के डिजाइन करने वाले वास्तुकार भी हर सुख-सुविधा का घर बनाते हैं। पर अगर हम तुमसे ये पूछें कि क्या तुमने कभी उल्टा घर भी देखा है, जिसका बेस उसकी छत की तरह हो और छत जमीन से सटी हो। हां, एक ऐसा घर बन कर तैयार है, जिसे देखकर ऐसा लगेगा, मानो कुछ देर पहले कोई जबरदस्त भूंकप ने इस घर को एकदम उलट दिया हो। जब तुम इसे देखोगे तो अपनी बाईं या दाईं तरफ घुमाकर उसे सीधा देखने की कोशिश करोगे।

इस घर के किचन से लेकर बाथरूम और हर एक कमरा अपने सिर के बल उल्टा लटका हुआ लगता है। 23 फीट ऊंचे इस घर में रहने के लिए वह हर स्थान है, जो एक परिवार के लिए जरूरी होता है। मगर यह घर रहने के लिए नहीं बनाया गया है। इस घर का निर्माण जर्मनी स्थित एक चिड़ियाघर के लिए किया गया है। यहां के स्थानीय कारपेंटर गैरहार्ड ने इस बारे में सोचा। फिर उसने अपने अन्य साथियों को इस बारे में बताया।

गैरहार्ड की बात सुनकर सबने उन्हें प्रोत्साहित किया और इस काम में मदद करने का आश्वासन दिया। इसके बाद ही गैरहार्ड ने इसका निर्माण कार्य आरंभ किया। करीब 50 अलग-अलग टुकड़ों की मदद से इस घर की छत को बनाया गया है। हर चीज को सही तरीके से करने में निर्माताओं को महीनों तक मेहनत करनी पड़ी। कारीगरों के मुताबिक आज उन्हें यह सुखद एहसास होता है कि उन्होंने दुनिया का एक निराला घर तैयार किया है। इस घर के बनने के बाद से यहां दूर-दूर से लोग इसे देखने के लिए प्रतिदिन आते हैं। इस चिड़ियाघर में लोगों की आवाजाही बढ़ गई है।

लैड से बच्चों को बचाने की पहल
पर्यावरण को दूषित होने से बचाने के लिए विश्व में अलग-अलग स्तर पर काम किया जा रहा है। हर संभव कोशिश की जा रही है कि जहीरीले पदार्थों से इस धरती को कैसे बचाया जाए। बच्चों को बड़ों से अधिक संवेदनशील माना जाता है। इसीलिए उन पर दूषित होते पर्यावरण का असर अधिक होता है। खेल-खेल में उनके स्वास्थ्य को खतरा न हो, इसकी पहल हो चुकी है। बेंगलुरू में बच्चों के खेलने का एक ऐसा पार्क तैयार है, जो खतरनाक शीशा यानी लैड से मुक्त है। इसके पीछे बेंगलुरू के बायोकैमिस्ट्री के रिटायर्ड प्रोफेसर थुप्पली वेंकटेश की मेहनत है। डॉक्टर वेंकटेश ने यहां देश का पहला ऐसा सेंटर तैयार करवाया, जो लैड के जहरीले कणों से लड़ने के विकल्प को ढूंढ़ रहा है। उन्होंने अपनी रिसर्च में पाया कि लैड मनुष्य को बहुत नुकसान पहुंचा सकता है।

खासकर के बच्चों का स्वास्थ्य। लैड से बच्चों का आई क्यू भी कम हो जाता है। अब उन्होंने यह भी बताया कि आखिर बच्चों तक लैड पहुंचता कैसे है। उनके मुताबिक बच्चों को  लैड के दुष्प्रभाव हर वक्त अपनी चपेट में लेने के लिए तैयार रहते हैं। घर, स्कूल व पार्क में इस्तेमाल किया जाने वाला पेंट ही बच्चों का सबसे बड़ा दुश्मन है। आमतौर पर प्रदूषण की परिभाषा गाड़ियों व फैक्टरियों के धुएं को ही दी जाती है। स्कूल बसों का पीला रंग और खेल के मैदान में इस्तेमाल किये जाने वाले अलग-अलग पेंट में भी लैड पाया जाता है। डॉ. वेंकटेश ने बच्चों के जीवन से लैड को दूर करने की शुरुआत बेंगलुरू के पार्क से करनी चाही, क्योंकि पार्क बच्चों की मस्ती की मनपसंद जगह है।

जब पार्क तैयार किया जाना था तो सबसे बड़ी मुश्किल यही थी कि आखिर लैड फ्री पेंट कहां से लाया जाए। हैरानी तब हुई जब किसी भी भारतीय पेंट निर्माता के पास लैड फ्री पेंट नहीं पाया गया। कुछ विज्ञापन उत्पादों में जरूर लैड फ्री का दावा किया जाता है, मगर उनकी संख्या न के बराबर है। इस समस्या से निपटने के लिए उन्होंने सबसे पहले मैसूर पेंट्स एंड लैक कंपनी को मनाया कि उनके लिए लैड फ्री पेंट तैयार करे।
 
दूसरे चरण में बेंगलुरू की जवाहर बाल भारती संस्था से बात की गई। यह एक ऐसा पार्क है, जहां हर रोज करीब 3 हजार बच्चों आते हैं। बस इसी पार्क को लैड फ्री बनाए जाने की योजना बनाई गई। योजना सफल हुई और पिछले दिनों सभी बच्चों के लिए इसे खोल दिया गया। डॉ. वेंकटेश चाहते हैं कि राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत देश के हर स्कूल व पार्क को लैड फ्री बनाया जाए। एर्नाकुलम के सरकारी अस्पताल पहल करते हुए पैडियाट्रिक डिपार्टमेंट को लैड फ्री बना रहे हैं। एक बार लोगों में जागरूकता आएगी और पेंट्स कंपनी साथ देंगी तो वे दिन दूर नहीं कि घर व बाहर हर जगह लैड फ्री पेंट का इस्तेमाल किया जाएगा। मजाेदार बात यह है कि लैड फ्री पेंट दूसरे पेंट के मुकाबले सस्ता भी है। मैसूर पेंट्स के मुताबिक जहां लैड फ्री पेंट 180 रुपए प्रति लीटर बिकेगा, वहीं दूसरे पेंट्स 250 रुपए प्रति लीटर से अधिक कीमत में बिक रहे हैं।


नमक की ईंटों पर खड़ा है ये होटल...
फाइव स्टार से फाइव स्टार डीलक्स होटल तक हर बड़े शहरों में देखे जाते हैं। उनकी दीवारों और छतों को बनाने में आमतौर पर सीमेंट, लोहा, ईंट, डस्ट आदि का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन सोचो कि अगर किसी होटल में दाखिल होते ही नोटिस बोर्ड पर होटल की दीवारों से छेड़छाड़ न करने की चेतावनी लिखी हो तो कितनी हैरानी होगी तुम्हें। जी हां, कुछ ऐसे शब्दों को बोलविया के एक होटल में लिखा देखा जा सकता है।

यह होटल पूरी तरह से नमक का बना हुआ है। समुद्रतल से 12,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस होटल को करीब से देखने व ठहरने के लिए हजारों पर्यटक हर साल पहुंच रहे हैं। यहां वे सभी सुविधाएं हैं, जो एक स्तरीय होटल से उम्मीद की जाती है। होटल को बनाने के लिए नमक की ईंटों का इस्तेमाल किया गया है। नमक की दीवारें यहां के तापमान को भी नियत्रित करती हैं। यहां रात में तापमान -9 और 5 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। यहां तकरीबन 60 हजार यात्राी हर साल आते हैं। यह होटल टूरिस्ट डेस्टिनेशन के रूप में पूरी दुनिया में मशहूर हो चुका है। लोग दूर-दूर से यहां रहने आते हैं और अलग अनुभव पाते हैं।

अब बीज बच जाएंगे...
सीड वॉल्ट एक बीज बैंक है। इसे बनाने में नॉर्वे और इंग्लैंड जैसे देशों का योगदान खासा अहम रहा है। दुनिया के कई देशों में ऐसे बीज बैंक हैं, जो  फसलों, फूलों और दूसरी चीजों के बीजों को संजोकर रखते हैं। ऐसा इसलिये होता है कि कभी भी विपदा के समय वह काम आ सकें। मगर अब इससे भी एक कदम आगे की बात वैज्ञानिकों ने की है। उन्होंने नॉर्थ पोल, जो दुनिया का बेहद ठंडा इलाका है, वहां पर एक बीज बैंक बनाया है।

यह बीज बैंक दूसरे बैंकों जैसा ही है। मगर इतना विशाल है कि तुम शायद सोच भी नहीं सकते हो। यह ऐसी जगह है, जहां पर इस तरह की विपदा आसानी से नहीं आएगी। इसके अलावा वैज्ञानिकों ने इस जगह को इसलिये भी चुना, क्योंकि यहां के बर्फीले मौसम में बीज को लम्बे समय तक के लिये बचा कर रखा जा सकता है। इसको बनाते समय कई देशों ने आपसी समझौते के तहत इस जगह को नो वार जोन में बदल दिया। यानी किसी भी सूरत में यहां युद्ध नहीं होगा।

यह सीड वॉल्ट बर्फ की चट्टानों को काटकर बहुत गहराई में अंदर तक बनाया गया है। इसमें किसी भी किस्म के लाखों की संख्या में बीज रखे हैं। दुनिया का कोई पेड़-पौधा ऐसा नहीं बचा है, जिसका बीज यहां पर मौजूद न हो। मजे की बात है कि यह बैंक किसी तरह की विपदा आने पर उस देश को बीज देने में किसी तरह की वसूली नहीं करता है। यह इस पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिये ही किया जा रहा है। आज हम कह सकते हैं कि भले ही पृथ्वी पर से डायनासोर जैसे जीव लुप्त हो गए हों, मगर आज पृथ्वी पर जीवन बचाने की यह कोशिश देखकर लगता है कि शायद इस हरी-भरी पृथ्वी पर इसकी हरियाली हमेशा कायम रहेगी।   

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