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यू. पी. पर निगाहें

दिल्ली के सिंहासन का मार्ग उत्तर-प्रदेश की तंग गलियों से होकर गुजरता है, इसीलिए आजकल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के सूरमा देश के सबसे बड़े सूबे के दो पाएदार दलों से जुगत भिड़ाने में लगे हैं। अमेरिका के साथ प्रस्तावित परमाणु करार पर वाम मोर्चे के अड़ियल रुख से परशान कांग्रेस को सरकार बचाने के लिए समाजवादी दल की दरकार है। माया राज की सख्ती से बेहाल मुलायम सिंह को भी केन्द्र की सरपरस्ती की जरूरत है। फौरी संकट को टालने के लिए फिलहाल दोनों दलों को एक-दूसर का सहारा चाहिए। यह राजनैतिक मोर्चाबंदी सन्निकट लोकसभा चुनाव के लिए भी आवश्यक है क्योंकि मायावती के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े की लगाम अकेले दम थामने का दम दोनों में से किसी दल में नहीं है। महंगाई की मार से बेहाल आम आदमी के समर्थन से सरकार बनाने का सपना पाल रही भाजपा को पता है कि उत्तर प्रदेश की अग्निपरीक्षा में उत्तीर्ण हुए बिना उसका भविष्य बनना कठिन है। पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में दस सीटों के कड़वे सत्य पर टिकी भाजपा को आभास है कि इस राज्य में पैर फैलाए बिना गुजारा नहीं हो सकता, इसीलिए केन्द्र सरकार से कुट्टी कर चुकी मायावती को लुभाने के लिए भाजपा ने मीठे बोल बोलने शुरू कर दिए हैं। कानपुर की संकल्प रैली में लालकृष्ण आडवाणी के भाषण से ऐसे ही संकेत आए हैं। बहनजी फिलहाल किसी जल्दबाजी में नहीं हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में मिली भारी सफलता से उनका आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है। बसपा का वोट बैंक हिलाने की हिम्मत किसी दल में नहीं है। हां, सभी प्रतिद्वंद्वियों के लिए परशानी खड़ी करने का फामरूला मायावती को मुंहजबानी याद है। आज राज्य में कोई दल उन्हें कुछ देने की स्थिति में नहीं है और किसी के साथ कुछ बांटने का उनका मूड नहीं। ऐसे में भाजपा का हाथ पकड़ने की भूल भला वह क्यों करंगी? उत्तर प्रदेश में कांग्रेस तो बरसों पहले सिमट चुकी है, जबकि भाजपा ने ताजा-ताजा झटका खाया है। सक्रिय राजनीति से अटल बिहारी वाजपेयी के हट जाने के बाद कमल के दल के पास उन जसा कोई जनप्रिय नेता नहीं है। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश से हैं, किन्तु वह राज्य इकाई की फूट पाटने तक में विफल रहे हैं। अपने गृह राज्य में सफलता पाए बिना पार्टी में चौधराहट बनाना उनके लिए कठिन रहेगा।

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