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राष्ट्रीय हित बनाम ‘राष्ट्रीय हिट’

भारत में राजनैतिक दल बनाना सबसे आसान और आम काम है। प्राय: हर व्यक्ित अपने आप में एक राजनैतिक दल है। ‘निस्वार्थ भाव से’ वह अपने मूल्यों-मर्यादाओं को समर्पित होता है। इनके लिए वह कुछ भी कर सकता है। इतनी मूल्यबद्ध राजनीति के बावजूद हमार बीच एक बड़ा वर्ग एसा भी है जिसका विश्वास राजनीति से उठने लगा है। संयोग है इन दिनों देश अनिश्चय के माहौल से गुजर रहा है। अर्थनीति और राजनीति दोनों में संशय है। चुनाव हों या न हों? डील हो या न हो? डौल बने या न बने? कोई खुश नजर आता है तो वो हैं आडवाणी जी वजह भी साफ है, अनिश्चय का फायदा उठाने को सबसे ज्यादा आतुर उनकी ही पार्टी है। व्याकुल हैं यूपीए वाले। वे चुनाव जल्दी नहीं चाहते। सत्ता के आखिरी लम्हे तक का माा चाहते हैं। दूसरी ओर वामपंथी दल अडिग हैं। वे शुरू से अडिग थे। अब अगले एक सप्ताह में कुछ बड़े फैसलों की उम्मीद है। समाजवादी पार्टी ‘राष्ट्रीय हित’ में कोई फैसला करगी। वाम दल ‘राष्ट्रीय हित’ में फैसला कर चुके हैं। यूपीए के घटक दल अपने-अपने ‘राष्ट्रीय हित’ खोज रहे हैं।वाम दल के एक नेता ने ठीक बात कही, सरकार कीमतों के बार में परशान क्यों नहीं है, न्यूक्िलयर डील को लेकर परशान क्यों है? यही सवाल उनसे भी पूछा जा सकता है- आप सरकार को अंतरराष्ट्रीय समझौता क्यों नहीं करने देते? समझौता नहीं हुआ तो क्या दाम गिर जाएंगे? समझौते को रोकने की माँग पर अड़ने के बजाय गरीबों की दशा सुधारने की योजनाओं की ओर ध्यान क्यों नहीं देते? आपको ईरान और चीन के हितों की फिक्र क्यों है? आपको लगता है कि यह सरकार देश को बेचने जा रही है तो उससे हाथ खींचने में देर क्यों लगा रहे हो? सब जानते हैं कि सन 2000 में जार्ज बुश की सरकार बनने के बाद से भारत सरकार अमेरिका के करीब जा रही है। तबसे क्या रहे थे? यूपीए को 2004 में समर्थन देना शुरू किया, तब क्या नहीं सोचा था? 2005 में भारत ने अमेरिका से महत्वपूर्ण सामरिक समझौता किया। तभी हाथ क्यों नहीं खींच लिया? न्यूक्िलयर डील पर तकनीकी बातें बेमानी हैं। वामपंथी दल अमेरिका के साथ व्यापक दोस्ती को किसी शर्त पर मंजूर नहीं कर सकते।आर्थिक और विदेश नीति पर हमारी राष्ट्रीय राजनीति की एकराय नहीं है। राष्ट्रीय सवालों पर यों भी सोचने का चलन नहीं है। तीन या चार मुख्य दलों को छोड़ दें तो ज्यादातर पार्टियाँ या तो स्थानीय मसलों पर ध्यान केंद्रित करती हैं या बेहद निजी किस्म के नेतृत्व के पीछे रहती हैं। पार्टी के नेता ने जहाँ हाँ कह दी, वहीं राष्ट्रीय हित होता है। देश को समग्र रूप से किस दिशा में जाने की जरूरत है, इसे लेकर गंभीरता नहीं है। विचारधारा कोई माने नहीं रखती। विचारधारा के सबसे बड़े प्रवर्तक वामपंथी दल भी व्यवहार में अपनी जकड़बंदियों से बाहर आ चुके हैं। पर वे किस माक्र्सवाद पर चलते हैं, यह बताना मुश्किल है। वैश्वीकरण और उदारीकरण की भूलभुलैया में फँसे वे विचार और व्यवहार के मामले में भटक चुके हैं। राष्ट्रीय राजनीति महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। यह गठबंधन सरकारों का दौर है। क्षेत्रीय दलों के उभार का समय है। क्षेत्रीय दलों में सपा, बसपा, बीजद, तेदेपा, द्रमुक, अद्रमुक, शिवसेना और अकाली दल सबसे महत्वपूर्ण हैं। कांग्रेस, भाजपा, वामदल और जनता परिवार कमोबेश राष्ट्रीय दल हैं। इनमें कांग्रेस और भाजपा ही असर के लिहाज से राष्ट्रीय हैं। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय का विभाजन किसी वैचारिक आधार पर नहीं है। केवल क्षेत्रीय असर ही महत्वपूर्ण है। द्रमुक और अद्रमुक में से कौन-सा दल द्रविड़ अस्मिता का प्रतीक है? अकाली दल सिखों का पूरी तरह प्रतिनिधित्व नहीं करता और न शिवसेना पूरी तरह मराठों का। तेदेपा के पीछे तेलुगु स्वाभिमान आज उस स्तर का नहीं है, जो एन टी रामाराव के दौर में था। कश्मीर की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस है या पीडीपी? बेशक हम बहुदलीय माहौल में हैं, पर यह बहुदलीयता कभी सांस्कृतिक भिन्नता के कारण रही भी होगी, पर आज ज्यादातर पार्टियों का वजूद व्यक्ितगत नेतृत्व के कारण है। राष्ट्रीय और प्रादेशिक दोनों स्तर पर करिश्माई नेतृत्व का लोप हो चुका है। कांग्रेस अपना करिश्मा खानदान में खोज रही है। उसके पास अब भी मैनेजर हैं, पर सीईओ नहीं है। मनमोहन सिंह साफ छवि के कारण बेहतर नेता हो सकते थे, पर पार्टी के दिग्गजों और वाममोर्चा जसे मित्रों के कारण वे लाचार हैं। क्षेत्रीय पार्टियां महत्वपूर्ण होने और गठबंधन सरकारं बनने का अर्थ यह नहीं कि राष्ट्रीय दल हाशिये पर हैं। उन्हें मजबूत बनाने की जरूरत है। तमाम क्षेत्रीय ताकतों के बावजूद पिछले 60 साल में ऐसा कभी नहीं हुआ कि लोकसभा में क्षेत्रीय पार्टियों की 50 प्रतिशत या उससे ज्यादा सीटें रही हों। कम से कम दो-तिहाई सीटें हर लोकसभा में राष्ट्रीय पार्टियों के पास रहीं। पिछले बीस साल में गठाोड़ सरकारं बनी जरूर हैं, पर उन्हें बनाने वाले गठाोड़ राष्ट्रीय किस्म के नेताओं के गठाोड़ थे। ज्यादातर सरकारं बचकाने तरीके से बनीं और फिर गिराई गईं। इस बार भी ऐसा ही लग रहा है। सरकार न भी गिर, पर संकट बेहद बचकाना है। खासकर ऐसे मौके पर जब पेट्रोलियम की कीमतों और खाद्य संकट के कारण वैश्विक स्तर पर अफरा-तफरी हो। इस अफरा-तफरी के बीच भी राजनीति को लोक-लुभावन मुहावरों की तलाश है। इसमें क्या क्षेत्रीय, क्या राष्ट्रीय हर पार्टी तेज रफ्तार से भाग रही है। बेहतर गवर्नेस, जनता की भागीदारी और उसके बुनियादी सवालों की फिक्र किसी को नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कुछेक महीने पहले कहा था कि वाममोर्चा सरकार से समर्थन वापस लेना चाहता है तो ले। इस बयान पर लीपा-पोती हुई और नाश्ते-पानी के दौर चले। पर क्या आज वही स्थिति नहीं है? सवाल केवल डील का नहीं है। सरकार के हर कदम का विरोध होगा, तो जनता के सामने क्या संदेश जाएगा? जनता व्यवस्था चाहती है। उसे अपनी सरकार पर भरोसा नहीं करने को मजबूर किया जाएगा, तो नतीजा क्या होगा? अनेकता हमारी ताकत है और कमजोरी भी। राजनीति परिपक्व हो तो गठबंधन सरकारों को चलाने में दिक्कत नहीं आती। परिपक्व न हो तो वही होता है जो 1में जबर्दस्त बहुमत जीतकर आए जनता परिवार का हुआ था। जनता की मंशा सरकारों को पूर पाँच साल का वक्त देने की होनी चाहिए। पर सरकार चलानेवाले इसमें नाकाम रहे तो जनता की अदालत में आने से घबराना भीड्ढr नहीं चाहिए। लेखक हिन्दुस्तान, दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं

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