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..तो इस साल घूमेगा विकास का पहिया

हरदोई हिन्दुस्तान संवाद

साल बीत गया पर विकास के जो मानक गढ़ने चाहिए थे वह बजट की कमी की बिल चढ़ गए। जिंला योजना सिमित के बजट का बीस फीसदी भीआविंटत नहीं हो सका। अब नए साल से लोगों को उम्मीद है कि साल 2014 का सूरज यहां विकास कार्यो को नई ऊर्जा देगा। नई सरकार और नए-नए सपने जो िदखाए गए थे पर वो क्या मात्र धोखा था।

विकास का जो सपना जनता ने देखा था वो क्या वाकई में छलावा था। हां अगरजिंला योजना के भेजे गए प्रस्तावों, मिली मंजूरी और आविंटत बजट को देखा जाए तो विकास की यह हकीकत छलावा ही मालुम होती है। साल 2013 के लिएजिंला योजना सिमित ने 242 करोड़ 56 लाख का भारी भरकम बजट मांगा थाजिंसे मंजूरी भी मिल गई थी। पर बीता साल इंतजार की राह ही तकता रह गया परजिंला योजना का बजट नहीं मिल सका। आंकडो पर गौर फरमाए तो कुल बजट के सापेक्ष दिसंबर तक मात्र 11 फीसदी ही बजट मिल सका था।

जिंसमें से भी 75 फीसदी खर्च किया जा चुका है। अबजिंला प्रशासन के पास विकास कार्यो को कराए जाने को धनराशि ही नहीं है अगर थोड़ी बहुत बची भी है तो वह इतनी कम है कि उससे नाम मात्र के काम ही करवाए जा सकते हैं। पीडब्लूडी, आरईएस, डीआरडीए, मनरेगा जैसे कई विभाग साल भर बजट की कमी से जूझते रहे। मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजना को साल के अिन्तम तक 20 करोड़ रुपए भी नही मिल सका। पीडब्लूडी को 64 करोड़ 59 लाख, नलकूप को 12करोड़ 21 लाख, पंचायती राज को 12 करोड़ 29 लाख, िचकित्सा को मात्र 15 करोड़ 69 लाख का बजट ही मिल सका।

बहरहाल विकास योजनाओं को अमली जामा पहनाने को बजट के एक बड़े हिस्से की जरूरत है। साल बीत गया पर बजट नहीं मिल सका अबजिंले को नए साल का इंतजार है जो शायदजिंले की तस्वीर को बदल दे। ं।

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