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हर बुराई की जड़ भ्रष्टाचार नहीं

आम आदमी पार्टी का उदय और कांग्रेस की करारी हार ने भारतीय राजनीति को बहुत रोचक बना दिया है। लेकिन क्या यह बदलाव भारत के इतिहास में एक नया और निर्णायक मोड़ ला पाएगा? मुझे इसमें संदेह है। आम चुनावों को लेकर उत्साह का माहौल है। इसके जो भी नतीजे आएं, लेकिन आशंका यही है कि नई सरकार के बनते ही सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आएगा।

संप्रग सरकार ने सूचना के अधिकार कानून और अब मजबूरन लोकपाल कानून बनाकर भ्रष्टाचार मिटाने के कदम जरूर उठाए, लेकिन आगे की कार्रवाई के लिए बहुत कम या एकदम नहीं काम हुए, जबकि इनकी जरूरत पड़ती है। भ्रष्ट लोगों के खिलाफ जांच कराना और उन्हें सजा दिलाना, दोनों काम लालफीताशाही में फंसकर रह गए, सुस्त कानूनी प्रक्रिया में उलझ गए और मीडिया भी इन्हें भूल गया। मीडिया द्वारा हर रोज नए घोटाले या घपले की खोज ने यह गलत धारणा बना दी है कि भ्रष्टाचार ही सभी बुराइयों की जड़ है और इसके उन्मूलन से भारत सुशासन का नया मॉडल बन जाएगा। घोटालों ने राजनेताओं की छवि इतनी खराब कर दी है कि सौम्य व्यवहार वाले इंसान, जैसे कि गोपाल कृष्ण गांधी तक राजनेताओं के खिलाफ सख्त भाषा का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें ‘खराब’ और उनके व्यवहार को ‘घिनौना’ बताते हैं। इसलिए सभी दलों के घोषणा-पत्रों में भ्रष्टाचार उन्मूलन प्रमुखता से रहेगा। लेकिन भ्रष्टाचार पर सारा ध्यान इस तथ्य पर परदा डालता है कि कुशासन के कई लक्षणों में यह अकेला ही है। अमेरिकी अर्थशास्त्री लैंट प्रीचेट ने एक नया मुहावरा गढ़ा है, ‘भारत एक विफल होता देश नहीं, बल्कि घिसटता हुआ देश है।’ ऐसा क्यों? क्योंकि, ‘नीतियों को लागू करने की भारत की क्षमता कमजोर है.. पुलिस में, कर-उगाही में, ऊर्जा में, जलापूर्ति में- लगभग सभी दैनिक सेवाओं में। वहां भारी अक्षमता, उदासीनता और भ्रष्टाचार है।’ गौर करें कि भ्रष्टाचार सबसे आखिरी में है। साफ है कि उनकी नजर में यह सबसे घातक नहीं है।

ऐसे कई सारे लोग हैं, जिनका सामान्य नजरिया है कि कुशासन ई-गवर्नेस और आधार कार्ड से ठीक हो जाएगा। चंडीगढ़ में जब एक सेमिनार में इस सलाह को आगे बढ़ाया गया था, तो वहां मैं मौजूद था। वहां ठहाके लग रहे थे, जब एक युवा पुलिस अधिकारी ने बताया कि ‘ई-गवर्नेस मददगार हो सकता है। मेरे पुलिसकर्मी अपना हफ्ता ई-मेल द्वारा लेते हैं।’ अकेले ई-गवर्नेस से भारत को सुशासन नहीं मिल सकेगा।

घोटालों का चिट्ठा खुलना और आम आदमी पार्टी का उदय, दोनों घटनाक्रमों ने एक उद्देश्य पूरा किया है, वह है व्यापक जागरूकता। विशेष रूप से आम लोगों के बीच यह बात पैठ चुकी है कि चीजें जिस तरह चल रही थीं, अब नहीं चल सकतीं। जयप्रकाश नारायण ने भारतीय युवाओं की शक्ति को दिखाया था, लेकिन उनका आंदोलन जनता पार्टी सरकार से मोह-भंग के साथ खत्म हुआ। उसकी पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए आज युवाओं को यह समझने की जरूरत है कि उनका आंदोलन आम आदमी पार्टी के भ्रष्टाचार विरोधी संकीर्ण एजेंडे से कहीं आगे जाने के लिए है। उन्हें उस आंदोलन को पूरा करने के लिए अभियान चलाना चाहिए, जिसे उनके पुरखों ने स्वतंत्रता संग्राम के समय शुरू किया था। वह आंदोलन था, काफी समय से कायम औपनिवेशिक विरासत से भारत को मुक्त करने का।

सार्वजनिक संस्थाओं की बुरी हालत और पुराने व बेकार पड़ चुके कानून आज भी उस औपनिवेशिक विरासत को जिंदा रखे हुए हैं। इन संस्थाओं के कर्ताधर्ताओं और कानूनों को अमल में लाने वाले लोगों का मन-मिजाज महत्वपूर्ण है। लेकिन कथित सिविल सर्वेट (नौकरशाह) न तो सिविल (शिष्ट) हैं और न ही सर्वेट (नौकर), बल्कि वे पहले के औपनिवेशिक शासकों जैसे हैं। घमंड से चूर कलेक्टर से लेकर नीचे प्रखंड विकास पदाधिकारी तक, गांव वालों की नजर में ऐसे अधिकारी हैं, जो विकास की राह में बाधा बनाते हैं। बड़े आईपीएस अधिकारी से लेकर (जिनकी गाड़ियों पर झंडा लहराता है) एफआईआर लिखने से मना करने वाले थानेदार तक, ये सब स्वराज नहीं, बल्कि राज के प्रतीक हैं।

इसी चीज से जवाहरलाल नेहरू डरते थे। अपनी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया  में उन्होंने लिखा है, ‘मालिक गोरे से सांवले न हों, बल्कि सचमुच में जनता का शासन हो, जो जनता द्वारा और जनता के लिए हो तथा इससे हमारी गरीबी व तंगहाली खत्म हो।’ ऐसा लिखकर वह महात्मा गांधी को याद करते हैं। मैं मानता हूं कि अगर ये दो समर्पित लोग आज के हिन्दुस्तान में लौट आते, तो यह देखकर निराश होते कि भविष्य को लेकर उनकी आशंकाएं आज कैसे सच हो रही हैं और गरीबी व बदहाली को खत्म करने की मंशा से यह मुल्क कितना दूर होता जा रहा है। नेहरू और गांधी, दोनों यह महसूस कर चुके थे कि उपनिवेशवाद एक शासन प्रणाली से कहीं अधिक गहरा जख्म दे गया है, यह सेवा नहीं, शासन की बात करता है। इसने अतीत के प्रति भारत के सम्मान को कम किया है। अपनी किताब राइचस रिपब्लिक में अनन्या वाजपेयी लिखती हैं कि राजनीति के आधुनिक रूप, जैसे बहुलतावाद, धर्मनिरपेक्षता, समतावादी लोकतंत्र भारत को संरक्षित नहीं रखते, बल्कि सदियों पुरानी विरासत भारत को संरक्षित करती है। आज वह विरासत महत्वहीन है और भारत डरा हुआ है कि इसमें धार्मिक तत्व हैं। लेकिन अनन्या यह बताती हैं कि स्वतंत्रता के पांच सबसे प्रभावी चिन्ह अतीत से ही लिए गए थे। नेहरू ने भारत की सबसे ‘पुरानी शक्ति’ को अपनी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया में खोजा था और अशोक के सिंह तथा बुद्ध-चक्र को नए राष्ट्र के प्रतीक के तौर पर चुना। गांधी के स्वराज और अहिंसा का भी पुराना इतिहास है।

अनन्या द्वारा बताई गई सदियों पुरानी विरासत युवाओं को एक दृष्टि प्रदान कर सकती है। यह दृष्टि युवाओं के सपनों को आंदोलित कर सकती है, उसे व्यवस्था के प्रति फिर से निष्ठावान बना सकती है और भलाई के लिए प्रेरित कर सकती है। यह भारतीयों को अपने पर नाज करने का मौका भी दे सकती है, और यह एहसास भी कि उसे पुराने ढर्रे पर नहीं जाना है। लेकिन युवा मतदाताओं को क्या विकल्प दिए जा रहे हैं?

चुनावी दौड़ में शामिल एक पार्टी घिसटती वंशवादी सरकार से कहीं व्यापक नजरिया पेश करती है। दूसरी पार्टी के पास भारत के अतीत का एक संकीर्ण नजरिया है, जो जोड़ता नहीं, बल्कि तोड़ता है। यह दृष्टिकोण व्यक्तिवादी है, यह वैसी ही निरंकुश हुकूमत की बात करता है, जो इंदिरा गांधी की विफलता का कारण बनी थी, जब आपातकाल के दौरान सत्ता पूरी तरह उनके हाथों में थी। इन दोनों से बाहर भ्रष्टाचार मुक्त भारत का एक आम नजरिया है, जो यह महसूस नहीं करता कि इस लक्ष्य को पाने के लिए किस तरह के बदलाव जरूरी हैं। हालांकि, केजरीवाल के इस नजरिये को जो प्रतिक्रिया मिली है, उससे उनकी बदलाव की इच्छाशक्ति का पता चलता है। इसलिए भी मैं अधिक निराश हूं। वह या अन्य नेता शायद यह महूसस करें कि शासन की बुराइयों को खत्म किए बिना और भविष्य के भारत का नजरिया पेश किए बिना भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं किया जा सकता। इन दोनों की जड़ें अतीत में हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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