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वैक्यूम के खिलाफ

नए साल के पहले दिन वह अपने कई परिचितों से मिले। पूरा दिन मिलने-मिलाने में गुजर गया। उन्होंने ठान लिया था कि अब और नहीं। नए साल में खुद के लिए अकेलापन नहीं होने देंगे। उन्होंने सही संकल्प लिया था। संकल्प एक महामारी के खिलाफ था, जो आज दुनिया की सबसे बड़ी दुश्मन है। स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के विख्यात मनोवैज्ञानिक इलियट अरोनसन कहते हैं कि हम अपने भीतर के वैक्यूम के लिए अमूमन परिस्थितियों को दोष देते हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में दोष अपना ही होता है। दरअसल, हम उतने अकेले होते नहीं, जितना हमें लगता है। आज की दुनिया में ज्यादातर लोग यह कबूल करने वाले हैं कि वे अकेले हैं, लेकिन उनसे यह पूछा जाए कि वे दूसरों का अकेलापन दूर करने के लिए क्या करते हैं, तो उनके पास बगलें झांकने के सिवा कोई चारा नहीं होगा। लंदन के बिहेवियरल इनसाइट संस्थान के निदेशक डेविड हेल्पर्न ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अकेले रहने वाले या अकेलापन पसंद करने वाले ह्यूमन रिसोर्स के तौर पर भी कमतर होते हैं और जैसे-जैसे यह समस्या बढ़ रही है, हम मानवता के स्तर पर भी चूक रहे हैं। एकाकी समाजों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति को देख उनकी चिंता को समझा जा सकता है। आज यह शिकायत बहुत आम है कि उसे कोई समझ नहीं रहा। पढ़े-लिखे लोग एक किस्म के वैचारिक अकेलेपन की बात कर रहे हैं। वे किसी से न जुड़ने के बहाने खोजते हैं और यह गौर नहीं कर पाते कि उनके बीच समानता के कई तत्व हैं। रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की ने युवावस्था में अकेलेपन से तंग आकर आत्महत्या की कोशिश की, बाद में गलती का एहसास हुआ, तो उन्होंने कहा कि खुद को अकेला समझना सबसे बड़ी भूलों में से एक है। गोर्की के दौर से हम काफी आगे आ गए हैं। आज यह समस्या और गहरी है। तो क्यों न हम सब संकल्प लें कि अपने भीतर ही नहीं, अपने इर्द-गिर्द भी चहल-पहल बढ़ाएंगे।

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