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एक मां की डायरी

आजकल जिस औरत को काम पर जाते देखती हूं, उसके पीछे छूट गए घर के बारे में सोचती हूं। कब लौटती होगी वह? उसके बच्चे होंगे क्या? उनका होमवर्क कौन कराता होगा? सुबह कितने बजे उठकर खाना बनाया होगा? पार्क में बच्चों के साथ चलती मांओं को देखती रहती हूं। बच्चों को बड़ा करने के अलावा कोई और मकसद होगा क्या इनकी जिंदगी का? वक्त मेरे नाम का बही-खाता खोलेगा, तो क्या-क्या निकलेगा बाहर? बच्चों के बड़े होते जाने पर तन्हाई मिलती है क्या? मेरे बच्चे मुझे कहां छोड़ देंगे?..मुझे उन तमाम औरतों की कहानियां आकर्षित करती हैं, जो अपने-अपने स्तर पर किस्मत से अलग-अलग तरीके से संघर्ष कर रही हैं। महत्वाकांक्षी औरतों के बारे में जानना चाहती हूं। वे कैसी औरतें होंगी, जो घर और बाहर, सब पर काबिज दिखती हैं? उनकी बेचैनियों के बारे में किसी ने तो लिखा होगा कहीं।गूगल  मुझे टोनी मॉरिसन (नोबेल विजेता) के एक इंटरव्यू की ओर लेकर जाता है। टोनी मॉरिसन। एक मां, वह औरत, जिसने अपनी लेखनी के जरिये ‘मदरहुड’ को नए सिरे से परिभाषित किया। टोनी की रची हुई मांएं मातृत्व के ‘स्टीरियोटाइप्स’ को तोड़ती हैं। उनमें सेथे जैसी मां है, जो अपने बच्चों को इस हद तक प्यार करती है कि उन्हें निजी जागीर समझती है। उनमें बेबी जैसी मां भी है, जो नाप-तौलकर प्यार अपने बच्चों को देती है कि कहीं उसके बच्चे उसे बहुत कमजोर न बना दें।..टोनी का इंटरव्यू पढ़कर लगा कि कोई तीसरी आंख है, जो खुल गई है।
मैं घुमंतू में अनु सिंह चौधरी

 

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