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सस्ती बिजली का तर्क

माना तो यही जाता है कि अर्थव्यवस्था की लगाम हमेशा राजनीति के हाथ में होती है। अर्थव्यवस्था कहां जाएगी, कैसे जाएगी, यह राजनेता ही तय करते हैं। आमतौर पर ऐसी शास्त्रीय धारणाएं आदर्श स्थितियों की सोच और तर्क पर आधारित होती हैं। हकीकत में इसके कई रूप और विद्रूप हमारे सामने आते हैं। बिजली के बिल को लेकर इस समय देश में जो राजनीति चल रही है, उससे लोगों को फौरी राहत भले ही मिल जाए, लेकिन उसमें कई बातें ऐसी भी हैं, जो भविष्य को लेकर डराती हैं। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की सरकार ने नए साल का तोहफा देते हुए जब विद्युत दरों को आधा कर दिया, तो यह अकेली ऐसी घटना नहीं थी। इसी के साथ हरियाणा सरकार ने भी बिजली के बिल में विशेष छूट की घोषणा कर दी। यह सिलसिला जारी रहा, तो जल्दी ही दूसरे राज्य भी यही करते दिखाई देंगे। लोगों को सस्ती बिजली मिले, इसमें कोई आपत्ति नहीं है। दिक्कत यह है कि यह राहत तर्कसंगत कम और चुनावी राजनीति का नतीजा ज्यादा है।

यह सच है कि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान यह वायदा किया था कि वह बिजली बिलों को आधा कर देगी। यह वायदा इस धारणा पर आधारित था कि बिजली कंपनियां गड़बड़ी करती हैं, विद्युत मीटर काफी तेज चलते हैं और बिलों में हेराफेरी होती है। मुमकिन है कि इसमें सच्चाई भी हो। इसकी जांच के लिए अरविंद केजरीवाल ने बिजली कंपनियों के लेखा परीक्षण का जो फैसला किया, वह स्वागत योग्य है। इसी तरह विद्युत मीटरों की जांच भी जरूरी है और ट्रांसमिशन में होने वाले नुकसान की भी। यह ऐसा काम है, जो पिछली सरकार को भी करना चाहिए था। लेकिन ऐसी किसी जांच के नतीजे आने के पहले सिर्फ चुनावी वायदा निभाने के नाम पर बिजली की दरों को आधा करने का फैसला किसी भी तरह से तार्किक नहीं कहा जा सकता। खासकर इसलिए भी कि अभी हमें यह नहीं मालूम कि यह जो सब्सिडी दी जा रही है, उसका पैसा आएगा कहां से? वैसे यहां यह भी याद रखना जरूरी है कि दिल्ली ऐसा राज्य है, जहां के निवासियों को देश में सबसे सस्ती बिजली मिलती है। बाकी कई राज्यों में तो न सिर्फ बिजली महंगी है, बल्कि इसके वितरण का काम दिल्ली की तरह निजी कंपनियों के हवाले नहीं, बल्कि राज्य विद्युत बोर्ड के हवाले है। महंगी बिजली देने के बावजूद ऐसे सभी बोर्ड घाटे में चल रहे हैं। दरअसल, मामला सस्ती या महंगी बिजली का नहीं, यह विद्युत क्षेत्र में बड़े सुधार का है। ताकि एक तरफ तो बिजली का उत्पादन बढ़े और दूसरी तरफ लोगों को सस्ती बिजली नियमित रूप से मिले। यह एक लंबा रास्ता है और इसके लिए जिस धैर्य की जरूरत होगी, उसकी चिंता फिलहाल किसी को नहीं। अलबत्ता, सस्ती बिजली देकर चुनावी लाभ उठाने की राह ज्यादा आसान है।

लेकिन ऐसा करने वाले उस आर्थिक जवाबदेही को धता बता देते हैं, जिसे निभाने की उनसे उम्मीद की जाती है। इस तरह की लोक-लुभावन राजनीति यह भी बताती है कि हमने भले ही कई मजबूरियों में आर्थिक उदारवाद को अपना लिया है, लेकिन हमारी राजनीति के मन, वचन और कर्म में उसके लिए कोई जगह नहीं है। यहां तक कि हमने संतुलन के लिए जो नियामक संस्थाएं बनाई हैं, वे भी बस औपचारिकता हैं। निजी कंपनियों पर लगाम लगाने के लिए दिल्ली में बाकायदा एक नियामक संगठन काम करता है, लेकिन यह संगठन भी हेराफेरी के आरोपों पर दिल्ली वासियों को आश्वस्त करने में नाकाम रहा है। सिर्फ विद्युत दरें नहीं, बहुत कुछ बदला जाना शेष है।

 

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