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नए साल में कदम रखते हुए

बेहद सर्द और सियाह रात में हमने 2013 को अलविदा कहा। अब तो सिर्फ मौसम विभाग के आंकड़े हमें बताएंगे कि हाड़ कंपाने वाली सर्द हवाएं किस हद तक कहर बरपाएंगी, मगर लगता है कि यह हमारे इतिहास की सबसे तकलीफदेह सर्दी साबित होने जा रही है- शायद इसलिए कि हमारे पास इतनी गैस भी नहीं कि अपने घरों को हम गरम रख सकें। कई स्तरों पर विभाजित पाकिस्तानी समाज को पिछले साल अगर किसी एक चीज ने एक-दूसरे से जोड़ने का काम किया था, तो वह बिजली की किल्लत थी। गरमियों में भयानक गरमी से निजात पाने के लिए हमारे पास बिजली नहीं थी और अब सर्दियों में ठंड से बचाने की उम्मीद भी उससे नहीं। साल 2013 की आखिरी रात उत्तरी पाकिस्तान के ज्यादातर इलाकों में कई लोगों ने मोमबत्तियों की रोशनी में लकड़ियों के चूल्हे पर रात का खाना पकाया। फिर भी हमारे पास ऐसी हुकूमत है, जो बिजली और गैस की हमसे ज्यादा कीमत वसूलने की चाहत रखती है। इन दोनों चीजों की सप्लाई बढ़ाने की सरकारी कोशिशें अटक-अटककर आगे बढ़ती रही हैं। ईरान के साथ गैस पाइपलाइन परियोजना ठिठक गई है, तो हिन्दुस्तान से बिजली खरीदने की कोई भी बातचीत ‘लाइन ऑफ कंट्रोल’ पर आकर दम तोड़ देती है। गैस और बिजली में हो रही लगातार कटौतियों ने ऐसे एहसास को जन्म दिया है, मानो हम एक सदी पीछे धकेल दिए गए हों। साल 2014 के पास हालात में बदलाव का खुशनुमा पैगाम नहीं दिखता। हालांकि पिछले साल ने अपने दामन में कई यादगार पल भी समेटे- मसलन, शांतिपूर्वक तरीके से कुरसी की अदला-बदली, बड़े ओहदों पर लोगों का जाना-आना। ट्रांसपेरेन्सी इंटरनेशनल  का भ्रष्टाचार संबंधी ऐलान। इसी तरह, कई पाकिस्तानियों ने अपने बूते नई बुलंदियों को छुआ। इनमें गिलगित-बालटिस्तान की दो बहनों का स्कीइंग के खेल में अगले साल के ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करना, मलाला की शोहरत और इज्जत के बारे में बताने की दरकार नहीं। हमारे देश के बाशिंदों में काबिलियत की कमी नहीं। अब जब हम 2014 में कदम रख चुके हैं, तो उन्हें निखारने की कोशिश करनी चाहिए।
द न्यूज, पाकिस्तान

 

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