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महाघोटालों का सच

‘स्पीक एशिया पोंजी स्कीम घोटाले ने देश के एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया है। यह इकलौता ऐसा उदाहरण नहीं है। ऐसे कई और उदाहरण मौजूद हैं। बता रहे हैं विवेक सिन्हा और गौरव चौधरी

हर सुबह नाश्ते से पहले 44 साल के मुकेश बिष्ट जब अपना लैपटॉप खोल कर स्पैम मेल समेत अपने सारे नये मेल चेक करते हैं तो पाते हैं कि बहुत सारे मेल अपमानजनक हैं, कुछ में उन्हें गंभीर नतीजे भुगतने की धमकी दी गई है तो कुछ में विनम्र अनुरोध भी किया गया है। बिष्ट को उनके नाम पढ़ने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वह जानते हैं कि वे लोग कौन हैं। ये उनके वे डाउनलाइन इन्वेस्टर्स हैं, जिन्हें उन्होंने स्पीक एशिया की निवेश योजना में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया था, जिस स्कीम में बाद में करोड़ों रुपये के घोटाले का पता चला। उन्हें आए इन ई-मेल्स की भाषा चाहे अलग-अलग हो, लेकिन सभी में एक ही मांग होती है कि सिंगापुर की स्पीकएशिया ऑनलाइन लिमिटेड (एसएओएल) की जल्दी अमीर बनने की इस योजना में निवेश करवाने के लिए प्रोत्साहित करने वाले ‘बिष्ट महोदय,’ अब हमारे उन पैसों की भरपाई आपको करनी चाहिए, जो आपके कहने पर हमने गंवा दिये। बिष्ट कहते हैं, प्रतिदिन इस तरह के अपमानजनक मेल देख कर मैं खुद को ठगा हुआ और असहाय महसूस करता हूं।

एसएओएल योजना के प्रमोटरों के गायब हो जाने के बाद देहरादून निवासी मुकेश बिष्ट के साथ-साथ 24 लाख भारतीय इस ठगी के शिकार हुए हैं। कंपनी ने अपनी योजना शुरू करते हुए इन्वेस्टर्स और पैनेलिस्ट से कहा था कि अगर आप साल में 52,000 रुपये कमाना चाहते हैं तो हर हफ्ते ऑनलाइन फॉर्म भरें। फॉर्म भरने वालों से कंपनी ने वायदा किया था कि इसके बदले उन्हें साल में सिर्फ 11,000 रुपये जमा करने हैं और यह रकम तीन महीने के भीतर उन्हें वापस मिल जाएगी। एसएओएल ने साथ में यह भी वायदा किया था कि वे जितने अधिक सदस्य बनाएंगे, उन्हें उतनी ही अधिक अतिरिक्त कमीशन भी मिलेगी।

बिष्ट बताते हैं, ‘स्पीक एशिया में मैंने जो शुरुआती पूंजी लगाई थी, वह मुझे तो मिल चुकी है, लेकिन मैं उन लोगों के लिए चिंतित हूं, जो मेरी सलाह पर इस योजना से जुड़े थे। मेरी चिंता यह है कि अगर उन लोगों का पैसा वापस नहीं लौटता तो मैं उनसे क्या कहूं?’

बिष्ट की इकलौती उम्मीद इस योजना के कथित सरगना राम सुमिरन पाल की भारत में हुई गिरफ्तारी से है। बहुएजेंसी जांच के बाद विशेषज्ञों का मानना है कि यह 2,200 करोड़ रुपये की एक व्यवस्थित वित्तीय ठगी है। अनुमान है कि इस ठगी में आठ और फर्मे भी शामिल हैं। इस सिलसिले में मुंबई पुलिस ने हाल ही में स्पीक एशिया के प्रमोटरों के खिलाफ 5000 पन्ने की एक चाजर्शीट दायर की है।

पिरामिड घोटाला
निवेशकों को छलने के लिए स्पीक एशिया ने एक वित्तीय पिरामिड योजना बनाई थी, जिसे पोंजी स्कीम कहा जाता है। यह नाम उस कार्लो पोंजी के नाम पर दिया गया है, जिसने अपने निवेशकों के सामने 1920 में एक स्कीम पेश की थी, जिसमें 45 दिन में 50 प्रतिशत मुनाफे का वायदा किया गया था और 90 दिन में 100 प्रतिशत का। उसने दावा किया था कि यह पैसा दूसरे देशों में छूट पर बिक रहे पोस्टल कूपन्स की अमेरिका में बिक्री से आएगा। पोस्टल कूपन बेचने में कुछ भी गैरकानूनी नहीं था। पोंजी चाहता तो इस व्यापार में कोई और व्यवस्थित तथा उचित तरीका अपना सकता था, लेकिन उसने इसके बदले एक अनोखा रास्ता अपनाया। उसने पुराने इन्वेस्टरों को नये इन्वेस्टरों से लिए पैसे से रकम वापस की और इसे तब तक जारी रखा, जब तक कि वह कानूनी जांच में फंस नहीं गया। इस बीच वह निवेशकों को लगभग दो करोड़ डॉलर का चूना लगा चुका था।

स्पीक एशिया से पहले के भारतीय उत्तराधिकारियों ने लगभग यही मॉडल अपनाया। सामान्यत: इन्होंने इसके लिए रीयल एस्टेट, हॉस्पिटेलिटी और मनोरंजन क्षेत्र का उपयोग किया। लेकिन विदेश में स्थित कंपनियों के लिए यह काम इंटरनेट के जरिये करना आसान रहा। एक शीर्षस्थ सरकारी अधिकारी ने बताया कि अपने खुद के सर्वर को छोड़ कर नेट इस्तेमाल करने वालों का उनके पास ऐसा कोई डाटा मौजूद नहीं है। हाल में सुपर फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (एसएफआईओ) की अंतरविभागीय बैठक में कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने अमेरिका आधारित ऑपरेटरों के बारे में यह मामला उठाते हुए चेतावनी दी थी।

एक घटना और देखें, अक्तूबर 2011 में कानपुर के 28 साल के समीर मनचंदा ने स्पीकएशिया के ऑनलाइन पैनेलिस्ट में शामिल होने के लिए 11,000 रुपये अपने एक रिश्तेदार से उधार लिये थे। वह कहते हैं, ‘शुरू-शुरू में मुझे यह अपने सपनों की नौकरी की तरह लग रही थी। पर कुछ महीनों बाद जब स्पीकएशिया से मेरे किसी भी डाउनलाइन इन्वेस्टर के पैसे वापस नहीं आए तो वे मुझसे पूछने लगे कि माजरा क्या है। तब मैं समझ गया कि मेरे सारे सपने चूर-चूर हो गए हैं।’

जागा बाजार
भारतीय नियामक संरचना इस तरह के किसी भी धोखे को रोकने के लिए तैयार नहीं है। हाल ही में भारत सरकार ने नियामक बाजार को सशक्त बनाने के लिए एक अध्यादेश पारित किया है कि सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) इस तरह की पोंजी स्कीम को रोके। इस संशोधन में सेबी को यह अधिकार दिया गया है कि जहां 100 करोड़ या इससे अधिक की पूंजी लगी हो, वहां वह नजर रखे कि नियमों का अनुपालन हुआ है या नहीं। वह ऐसे मामलों में भी जानकारी प्राप्त कर सकती है, जिसमें उसे लगे कि कोई संदिग्ध व्यक्ति अथवा संगठन अवैध लेन-देन में लगा है। इस अर्थ में देखें तो स्पीकएशिया घोटाले ने बाजार को जगा दिया है।
(रिपोर्ट में वर्णित लोगों के नाम उनके अनुरोध पर बदल दिए गए हैं)

क्यों कहते हैं पोंजी घोटाला
यह नाम उस कार्लो पोंजी के नाम पर दिया गया है, जिसने अपने निवेशकों के सामने 1920 में एक स्कीम पेश की थी, जिसमें 45 दिन में 50 प्रतिशत मुनाफे का वायदा किया गया था और 90 दिन में 100 प्रतिशत का। उसने दावा किया था कि यह पैसा दूसरे देशों में छूट पर बिक रहे पोस्टल कूपन्स की अमेरिका में बिक्री से आएगा। पोस्टल कूपन बेचने में कुछ भी गैरकानूनी नहीं था। उसने इसके बदले एक अनोखा रास्ता अपनाया। पुराने इन्वेस्टरों को नये इन्वेस्टरों से लिए पैसे से उनकी रकम वापस करने का। इसे उसने तब तक जारी रखा, जब तक कि वह कानूनी जांच में नहीं फंस गया। इस बीच वह निवेशकों को लगभग दो करोड़ डॉलर का चूना लगा चुका था।

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